इस कृति के माध्यम से दक्षिण भारत के अहिन्दी भाषी राज्यों यथा आन्ध्र प्रदेश व तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु व महाराष्ट्र के संक्षिप्त इतिहास के साथ उन 167 प्रमुख सन्तों, कवियों व महापुरुषों की साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चिन्तन व उनके उपलब्ध चित्रों की धरोहर को राजभाषा हिन्दी के पाठकों के अध्ययन हेतु उपलब्ध कराने की दिशा में एक प्रयास है; जिन्होंने मानवीय एकता एवं समरसता के उत्थान के लिए जीवनयात्रा में शीर्ष में पहुँचकर अनुपम साहित्य का सृजन किया। इन महापुरुषों को नियन्त्रित करने के लिए सत्तासीन व वर्चस्ववादी समाज ने तरह-तरह के उत्पीड़न किये फिर भी उन्होंने हार नही मानी और कुछ ने तो अपने प्राणों की आहुति भी दे दी।
मुख्यतः संरचनात्मक धारणाओं के माध्यम से साहित्य के द्वारा समाज का विकास होता है। हर महान साहित्य रचना या कलाकृति एक प्रकार की सामूहिक दृष्टि को अभिव्यक्त करती है। यह दृष्टि एक समवेक समूह के रूप में मन की उपज है, जो लोक-साधक संतों, कवियों या चिंतकों के मनःपटल में उत्कर्ष के अंतिम सोपान पर पहुँच जाती है। संतों के काव्य के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि यह उनकी विचारधारा निर्गुण-ज्ञानमार्गी तथा सगुण-भक्तिमार्गी प्रेमभावना की ओर ले जाती है। उसे हम वस्तुतः एक वैश्विक दृष्टिकोण की संतुष्टि की ओर ले जाने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहते हैं। 'दक्षिण भारत के सन्त' कृति में वैचारिक संवेदना के अन्तर्गत संत-कवियों की तद्समय की लोक-भावना यथा धर्म, नीति, मजहब, दर्शन, शील, प्रज्ञा व समाज की अनेकता में एकता दिखाने का प्रयास किया गया है। अशोक के 'छठवें शिलालेख' में कहा गया है कि ""मैं कितना ही परिश्रम करूँ और कितना ही राजकार्य करूँ, मुझे संतोष नहीं होता.... जो कुछ परिश्रम मैं करता हूँ, वह इसलिए कि प्राणियों के प्रति जो मेरा ऋण है, उससे उऋण हो जाऊँ।""
सी.एल. सोनकर
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 464p |
| Publisher | Lokbharti Prakashan |
| Dimensions | 22 X 14 X 2.5 |