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Bharat Mein Garibi

Edition: 2026, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Bharat Mein Garibi

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भारत में आजादी के बाद सामान्य जीवन स्तर में जहां काफी सुधार दिखता है, और मध्यवर्ग का विस्तार भी उल्लेखनीय स्तर पर हुआ है, वहीं यह भी एक हकीकत है कि न तो हमारी गिनती अमीर और विकसित देशों में की जा सकती है, और न ही वास्तविक धरातल पर वह सुख-समृद्धि कहीं दिखाई देती है, जो किसी भी विकसित देश में होनी चाहिए।

इसके अनेक कारण रहे हैं, सिर्फ जनसंख्या इसकी वजह नहीं है जैसा कि अक्सर कह दिया जाता है। यह किताब उन्हीं वास्तविक कारणों पर उंगली रखती है जिनके चलते हम विकासशील की श्रेणी से चाहकर भी नहीं निकल पा रहे हैं। विकास की प्रभावशीलता को कमजोर करने वाले एक घटक के रूप में लेखक यहां अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र की बहुतायत और श्रम-बल में सामाजिक सुरक्षा का अभाव को रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि गरीबी में कमी, मानव क्षमताओं में वृद्धि और निरन्तर आर्थिक विकास के बीच पारस्परिक रूप से एक मजबूत सम्बन्ध है।

लेखक के अनुसार किसी भी विकासशील देश में गरीबों के बहुत कम शिक्षित, या पूर्णतः निरक्षर होने की सम्भावना होती है। इस प्रकार, हम भारत के सामने मौजूद शैक्षिक संकट की गहराई को समझे बिना भारत में गरीबी को नहीं समझ सकते।

भारत में बच्चों और वयस्कों में कुपोषण का स्तर दुनिया में सबसे ऊँचे स्तरों पर है, फिर भी ऐतिहासिक रूप से इस पर उस तरह का नीतिगत ध्यान नहीं दिया गया, जैसा दिया जाना चाहिए। ऐसे तमाम कारणों पर विस्तार से बात करते हुए इस पुस्तक में इनके निवारण पर भी गहराई से विचार किया गया है।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026, Ed. 1st
Pages 232p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1.5
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Santosh Mehrotra

Author: Santosh Mehrotra

सन्तोष मेहरोत्रा

सन्तोष मेहरोत्रा डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट हैं और यूनिवर्सिटी ऑफ़ बाथ, यू.के. में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैं। इसके अलावा वह हायर स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स, मॉस्को में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत हैं। इससे पहले वे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली में इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर थे। न्यू स्कूल फ़ॉर सोशल रिसर्च, न्यूयॉर्क से इकोनॉमिक्स में एम.ए. और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पी-एच.डी. (इकोनॉमिक्स, 1985) करने के बाद, उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में शोध सम्बन्धी पदों पर 15 साल (1991-2006) बिताए। वे फ्लोरेंस के इनोसेंटी रिसर्च सेंटर में विकासशील देशों के लिए सोशल पॉलिसी पर यूनीसेफ के ग्लोबल रिसर्च प्रोग्राम का नेतृत्व कर रहे थे। ग्लोबल ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट न्यूयॉर्क के चीफ़ इकोनॉमिस्ट भी रहे। योजना आयोग के ग्रामीण विकास विभाग और विकास नीति विभाग का नेतृत्व (2006-09) करने के लिए भारत लौटे। वे भारत की 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजनाओं के कई अध्यायों के मुख्य लेखक थे। योजना आयोग के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ लेबर इकोनॉमिक्स रिसर्च के डायरेक्टर जनरल (2009-14) भी रहे। वे भारत सरकार के सेक्रेटरी के रैंक पर थे। उनकी 14 किताबें प्रकाशित हैं—हिन्दी में उनकी दो किताबें : ‘हर हाथ को काम’ (2025) और ‘विकास से हारेगा नक्सलवाद’ (2018) चर्चित रही हैं। उनकी पुस्तकों का हिन्दी, स्पैनिश, फ्रेंच, इटैलियन, रशियन, जर्मन और पुर्तगाली भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

वह नियमित रूप से अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन, एशियाई विकास बैंक, यूएनडीपी, यूनेस्को और यूएनईवीओसी को परामर्श देते हैं। विकास के मुद्दों पर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया—दोनों माध्यमों में लगातार उनकी भागीदारी रहती है।

ई-मेल : [email protected] 

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