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Anuvad Sidhant Evam Prayog-Hard Cover

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9788180313684
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प्रस्तुत ग्रन्थ को तीन भागों में बाँटा गया है—पहले भाग में अनुवाद के स्वरूप एवं प्रक्रिया पर विचार करते हुए अनुवाद की समस्याओं की सैद्धान्तिक भूमिका को स्पष्ट किया गया है। अनुवाद को एक परकाय-प्रवेश की प्रक्रिया मानते हुए अर्थ को आत्मा और शैली को शरीर माननेवाले सिद्धान्तों की नवीन व्याख्या की गई है तथा अनुवाद के प्रमुख सिद्धान्तों का समन्वय किया गया है। लेखक का विचार है कि अनुवाद विषयक अध्ययन में अर्थ को केन्द्र में रखना चाहिए न कि एक बाह्य तत्त्व के रूप में आनन्दवर्द्धन का ध्वनि सिद्धान्त एवं मैलिनोव्स्की का ‘सांस्कृतिक सन्दर्भ’ सिद्धान्त अनुवाद में अर्थ की समस्याओं के अध्ययन के लिए विशेष उपयोगी है। आधुनिक भाषाविज्ञान का सहारा लेते हुए शैली की समस्याओं का प्रमुख रूप से स्वनिमस्तरीय, शब्दस्तरीय, रूपस्तरीय एवं वाक्यस्तरीय समस्याओं के रूप में वर्गीकरण किया गया है। ग्रन्थ के दूसरे भाग में अनुवाद के रूपों का विश्लेषण किया गया है। तीसरे भाग में अनुवाद की कुछ विशिष्ट अर्थपरक एवं शैलीपरक समस्याओं का अनुप्रयोगात्मक अध्ययन करते हुए उनके लिए व्यावहारिक समाधान ढूँढ़ा गया है।

भारत जैसे बहुभाषा-भाषी राष्ट्र में अनुवाद का महत्त्व स्वयंसिद्ध है। यूरोपीय देशों में प्राचीन काल से ही अनुवाद के कुछ सामान्य सिद्धान्तों को क़ायम करने का प्रयास किया गया है। भारत में सम्भवतः अनुवाद को मौलिक लेखन से अभिन्न या उसके समकक्ष मान लेने के कारण अनुवाद के सिद्धान्तों का विशेष विकास नहीं हो पाया है। भारतीय भाषाओं में प्रायः अनुसृजन, भाषानुवाद या अनुकरण ही ज़्यादातर होते आए हैं। लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक युग की माँग है कि अनुवाद प्रामाणिक हो और उसके लिए कुछ सुनिश्चित सिद्धान्त अपनाए जाएँ।

अनुवाद विषयक प्रारम्भिक चिन्तन बाइबिल के अनुवादकों के आधार पर ही विकसित हुआ। पुनर्जागरण के बाद काव्य तथा अन्य साहित्यिक विधाओं के अनुवाद की प्रक्रिया एवं सिद्धान्तों की ओर अनुवादकों का ध्यान गया। तीसरा युग अनुवाद के भाषा-वैज्ञानिक सिद्धान्तों का युग है। बीसवीं शताब्दी में तुलनात्मक एवं व्यतिरेकी अध्ययन का विकास यंत्रानुवाद के प्रयोग तथा आदिवासियों की भाषा से अनुवाद के सिलसिले में भाषा-वैज्ञानिकों का ध्यान अनुवाद की ओर गया। यंत्रानुवाद की विशेष आवश्यकता संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसी संस्थाओं में एक ही समय में विभिन्न भाषाओं में किए जानेवाले अनुवाद के सन्दर्भ में अधिक महसूस की गई। यूनेस्को के अधीन कार्यरत अनुवादकों का अन्तरराष्ट्रीय संगठन तथा यूरोप और अमेरिका के कई अनुवाद परिषदों ने भी अनुवाद-चिन्तन को एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।

अनुवाद पर भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से सोचने की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि अनुवाद की समस्याओं का भाषा के विभिन्न पक्षों, विशेषकर स्वनिम, शब्द, रूप, वाक्य तथा अर्थ से अभिन्न सम्बन्ध है। अनुवाद की समस्याओं के विश्लेषणात्मक अध्ययन में भाषा-वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यक हो जाता है। पश्चिमी देशों के भाषा-वैज्ञानिकों ने इस प्रकार के कई अध्ययन प्रस्तुत किए हैं जो अनुप्रयुक्त भाषा-विज्ञान के अन्दर आते हैं। परन्तु जार्ज स्टीनर जैसे विद्वानों का कथन है कि अनुवाद अनुप्रयुक्त भाषा-विज्ञान नहीं है, वह तो साहित्य के सिद्धान्त एवं प्रयोग का एक विशिष्ट क्षेत्र है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2008
Edition Year 2017, Ed. 7th
Pages 99p
Price ₹300.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 21 X 13.5 X 1
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Author: G. Gopinathan

जी. गोपीनाथन


जन्‍म : जी. गोपीनाथन का जन्म 20 अप्रैल, 1943 को केरल के तिरुवनंतपुरम ज़ि‍ले के बलरामपुरम गाँव में हुआ था।

शिक्षा : हिन्‍दी में एम.ए., पीएच.डी. और डी.लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

जी. गोपीनाथन ने रूसी भाषा में डिप्लोमा प्राप्त कर कालिकट विश्वविद्यालय के हिन्‍दी विभाग में प्राध्यापक, रीडर, प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्‍दी विश्वविद्यालय, वर्धा में कुलपति, फिनलैंड के हेलसिंकी विश्वविद्यालय और वारसॉ यूनिवर्सिटी पोलैंड में विज़ि‍टिंग प्रोफ़ेसर रहे।

प्रकाशित प्रमुख कृतियाँ : ‘केरलियों की हिन्‍दी को देन’, ‘मलयालम की नई कविताएँ’, ‘अनुवाद : सिद्धान्‍त और प्रयोग’, ‘अनुवाद की समस्‍याएँ’, ‘केरल की सांस्‍कृतिक विरासत’, ‘क्रान्तिकारी सन्‍त श्रीनारायण गुरु की कविताएँ’, ‘विश्‍व भाषा हिन्‍दी की अस्मिता’ आदि।

उन्‍होंने ‘कालिकट यूनिवर्सिटी रिसर्च जर्नल’ (भाग 1, 2), ‘तुलनात्‍मक साहित्‍य विश्‍वकोश’, ‘बहुवचन’, ‘पुस्तक वार्त्ता’, ‘हिन्‍दी विमर्श’ का सम्‍पादन किया।

‘राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार’, ‘नातालि पुरस्कार’, ‘साहित्य साधना सम्मान’, ‘भाषा सेतु सम्मान’, ‘साहित्य वाचस्पति’, ‘कुसुम अहिन्‍दी भाषी हिन्‍दी सम्मान’, ‘सौहार्द सम्मान’ आदि अनेक सम्मानों से अलंकृत।

उन्‍होंने विश्व के प्रायः सभी प्रमुख देशों की अकादमिक यात्राएँ की हैं। 

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