Aadivasi Kaun

Author: Ramanika Gupta
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Aadivasi Kaun
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आज अगर सबसे बड़ा ख़तरा आदिवासी जमात को है, तो वह है उसकी पहचान मिटने का। इक्कीसवीं सदी में उसकी पहचान मिटाने की साज़‍िश एक योजनाबद्ध तरीक़े से रची जा रही है। किसी भी जमात, जाति, नस्ल या कबीले अथवा देश को मिटाना हो तो उसकी पहचान मिटाने का काम सबसे पहले शुरू किया जाता है। ‘आदिवासी’ की पहचान और नाम छीनकर उसे ‘वनवासी’ घोषित किया जा रहा है ताकि वह यह बात भूल जाए कि वह इस देश का मूल निवासी यानी आदिवासी है—वह भूल जाए अपनी संस्कृति, भाषा और अपना मूल धर्म ‘सरना’।

यह पुस्तक आदिवासियों के जीवन के कई ऐसे अनछुए पहलुओं को हमारे सामने लाती है जिनसे अभी तक हम अपरिचित थे। स्वयं आदिवासियों द्वारा क़लमबद्ध किए गए विचारों को यहाँ दिया गया है। आदिवासियों की दशा में परिवर्तन कैसे हो, उनकी शिक्षा कैसी हो व किस प्रकार उनके जीवन से जुड़ी सभी समस्याओं का निदान किया जाए, जैसे सवालों को भी यहाँ उठाया गया है।

आदिवासियों के अस्तित्व की बानगी प्रस्तुत करती यह पुस्तक सभी के लिए महत्त्वपूर्ण है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back, Paper Back
Publication Year 2008
Edition Year 2022, Ed. 7th
Pages 204p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 1.5
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Ramanika Gupta

Author: Ramanika Gupta

रमणिका गुप्ता

जन्म : 22 अप्रैल, 1930; सुनाम (पंजाब)।

शिक्षा : एम.ए., बी.एड.।

रमणिका गुप्ता बिहार/झारखंड की विधायक एवं विधान परिषद् की सदस्य रहीं। कई ग़ैर-सरकारी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से सम्बद्ध तथा सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक कार्यक्रमों में सहभागिता। आदिवासी, दलित, महिलाओं व वंचितों के लिए आजीवन कार्यरत। कई देशों की यात्राएँ। विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित जिनमें ‘गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार’, ‘आजीवन आदिवासी बंधु पुरस्कार’ भी शामिल हैं।

प्रकाशित कृतियाँ : अब तक 16 कविता-संग्रह, दो उपन्यास, दो कहानी-संग्रह, दो कहानी-संग्रह सम्पादित, एक यात्रा-संस्मरण और दो आत्मकथा—‘आपहुदरी’ व ‘हादसे’। राष्ट्रीय आदिवासी दलित व नारी-विमर्श पर महत्त्पूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके द्वारा सम्पादित दलित, स्त्री एवं आदिवासी विषयक पुस्तकें बहुचर्चित रही हैं। ‘निज घरे परदेसी’, ‘साम्प्रदायिकता के बदलते चेहरे’, ‘आदिवासी स्वर और नई शताब्दी’, ‘आदिवासी : विकास से विस्थापन’, ‘आदिवासी साहित्य यात्रा’, ‘आदिवासी शौर्य एवं विद्रोह (पूर्वोत्तर)’, ‘आदिवासी शौर्य एवं विद्रोह (झारखंड)’, ‘आदिवसी सृजन, मिथक एवं अन्य लोककथाएँ (झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात और अंडमान-निकोबार)’, ‘आदिवासी लेखन एक उभरती चेतना’, ‘आदिवासी अस्मिता के संकट’, ‘आदिवासी सहित्य और समाज’ एवं ‘विमुक्त-घुमन्तू आदिवासियों का मुक्ति-संघर्ष’ आदिवासी-विमर्श पर इनकी उल्लेखनीय लिखित, संकलित एवं सम्पादित पुस्तकें हैं। स्त्री-विमर्श पर भी इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं।

वे आजीवन ‘रमणिका फ़ाउंडेशन’ की अध्यक्ष रहीं। उन्‍होंने सन् 1985 से ‘युद्धरत आम आदमी’ (मासिक हिन्दी पत्रिका) का सम्पादन किया।

निधन : 26 मार्च, 2019

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