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Pratinidhi kahaniyan : Ramdarash Mishra-Paper Back

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रामदरश मिश्र की कहानियों का व्यास चौड़ा है। उनकी चिन्ताओं का छोर व्यापक है। किन्तु जिस एक बात को उन्होंने आज तक सर्वाधिक तरजीह दी है, वह है कहानियों की पठनीयता। वे प्रेमचन्द और रेणु के बाद की पीढ़ी के ग्रामीण रचनाकार हैं सो वे ग्रामीण भारत की समस्याओं को नहीं भूलते, अपने इलाके का दर्द नहीं भूलते। वहाँ का सामन्ती आचरण, दरिद्रता, गरीबी, मान-अपमान, अहं में जी रहा सवर्ण समुदाय, भूखे रहने पर विवश दलित और वंचित—सब उनकी निगाह में हैं। उनकी कहानियाँ इन सभी मुद्दों को उठाती हैं। जिस लहज़े में ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल ने लिखा है, यहाँ से भारतीय देहात का महासागर शुरू होता है, वह महासागर रामदरश जी के कथा संसार में लहराता मिलता है। कितने आन्दोलन उनके सामने से होकर गुजरे, पर वे उस शोर-शराबे के बीच भी अनुभव, बोध और रूपबन्ध के स्तर पर वैविध्यपूर्ण कहानियाँ लिखते रहे और आज भी उसी त्वरा के साथ विभिन्न विधाओं को अपनी रचनात्मकता से समृद्ध कर रहे हैं। प्रतिनिधि कहानियाँ में सम्मिलित कथा संसार उनकी इसी बहुवस्तुस्पर्शिता का परिचायक है।
—ओम निश्चल

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2022
Edition Year 2025, Ed. 2nd
Pages 143p
Price ₹199.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 18 X 12 X 1
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Ramdarash Mishra

Author: Ramdarash Mishra

रामदरश मिश्र

रामदरश मिश्र का जन्म 15 अगस्त, 1924 को जिला गोरखपुर, उत्तर प्रदेश के डुमरी गाँव में हुआ। आपने एम.ए., पी-एच.डी. की डिग्री हािसल की। आप लम्बे समय तक अध्यापन से जुड़े रहे और दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रोफेसर के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

आपकी प्रकाशित रचनाएँ हैं—‘पथ के गीत’, ‘बैरंग बेनाम चििट्ठयाँ’, ‘पक गई है धूप’, ‘कंधे पर सूरज’, ‘दिन एक नदी बन गया’, ‘जुलूस कहाँ जा रहा है’, ‘आग कुछ नहीं बोलती’, ‘बारिश में भीगते बच्चे’, ‘आम के पत्ते’, ‘कभी कभी इन दिनों’, ‘मैं तो यहाँ हूँ’, ‘रात सपने में’, ‘मैं तो यहाँ हूँ’, ‘समवेत’ सहित दो दर्जन काव्य कृतियाँ; ‘बाज़ार को निकले हैं लोग’, ‘हँसी ओठ पर आँखें नम हैं’ सहित कई ग़ज़ल-संग्रह; ‘पानी के प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’, ‘सूखता हुआ तालाब’, ‘रात का सफर’, ‘अपने लोग’, ‘आकाश की छत’, ‘आदिम राग’, ‘बिना दरवाजे का मकान’, ‘दूसरा घर’ सहित डेढ़ दर्जन उपन्यास; ‘खाली घर’, ‘एक वह’, ‘बसंत का एक दिन’, ‘आज का दिन भी’, ‘एक कहानी लगातार’, ‘फिर कब आएँगे?’, ‘अकेला मकान’, ‘विदूषक’, ‘आखिरी चिट्ठी’ सहित दो दर्जन कहानी-संग्रह; ‘कितने बजे हैं’, ‘बबूल और कैक्टस’, ‘घर-परिवेश’, ‘नया चौराहा’, ‘लौट आया हूँ मेरे देश’ (निबन्ध चयन); ‘तना हुआ इंद्रधनुष’, ‘भोर का सपना’, ‘पड़ोस की खुशबू’, ‘घर से घर तक’ (यात्रा-वृत्तांत); ‘स्मृतियों के छंद’, ‘सर्जना ही बड़ा सत्य है’ सहित कई संस्मरणात्मक कृतियाँ; सहचर है समय (आत्मकथा); ‘आस-पास’, ‘बाहर-भीतर’, ‘विश्वास जिन्दा है’, ‘अपना कमरा’ (डायरी); चौदह खंडों में रचनावली का प्रकाशन, आलोचना की ग्यारह पुस्तकें। कई चयन-संचयन।

आप ‘भारत भारती’, ‘साहित्य अकादेमी’, ‘दयावती मोदी कवि शेखर पुरस्कार’, ‘शलाका सम्मान’, ‘व्यास सम्मान’, ‘सरस्वती सम्मान’ सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हैं।

निधन : 31 अक्टूबर, 2025

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