बांग्लादेश के चर्चित लेखक सलाम आज़ाद की क़लम शासन-व्यवस्था के लिए चुनौती की तरह है, क्योंकि इनकी रचनाएँ शासकों की क्षुद्र व छद्म नीति की पोल खोल देती हैं। धर्म व राजनीति के कारण जब भी किसी देश का बँटवारा होता है तो लकीरें सरहद पर ही नहीं पड़तीं, लोगों के दिलों में भी खरोंचें लगती हैं। आम इनसानों की ज़िन्दगी पर बँटवारे का दूरगामी और विडम्बनापूर्ण प्रभाव पड़ता है तथा इनसानियत धार-धार रोती रह जाती है। सलाम आज़ाद की कहानियों को पढ़ते हुए शिद्दत के साथ यह अहसास होता है।
सलाम आज़ाद साम्प्रदायिक सौहार्द एवं धर्मनिरपेक्ष विकास के पक्षधर हैं। लिहाज़ा उनकी क़लम फासिस्ट शक्तियों के निशाने पर रहती है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि उनकी कुछ रचनाओं को बांग्लादेश में प्रतिबन्धित कर दिया गया है।
इस संग्रह में लेखक की कुछ अन्य विषयों से सम्बन्धित कहानियाँ भी संकलित हैं जो उनके गहरे मानवीय सरोकारों को रेखांकित करती हैं। ‘जनक’ और ‘मानवाधिकार’ ऐसी ही मर्मस्पर्शी कहानियाँ हैं जो पाठकों के मन में रचनात्मक बेचैनी पैदा करती हैं। इन कहानियों का प्रवाहपूर्ण भाषा में सर्जनात्मक अनुवाद हुआ है जो पाठकों को अपनी रौ में बहा ले जाता है।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Isbn 10 | 8126710233 |
| Publication Year | 2004 |
| Edition Year | 2004, Ed. 1st |
| Pages | 99p |
| Price | ₹50.00 |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 22.5 X 14.5 X 1.5 |