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Nakbesar Kaga Le Bhaga-Paper Back

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9789348157430
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चन्द्रकिशोर जायसवाल की कहानियों में भारतीय जीवन का यथार्थ अपने उसी रूप में आता है, जिस रूप में वह हमारे रोज़मर्रा जीवन का हिस्सा होता है। कोई वाद या विचार उसे न विकृत करता है, न महिमामंडित।

इस संग्रह में उनकी चर्चित कहानी ‘नकबेसर कागा ले भागा’ के अलावा छह और कहानियाँ शामिल हैं जो जीवन के विभिन्न पक्षों और हमारे आसपास के चरित्रों के सामाजिक और मानसिक अन्तर्जीवन का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करती हैं।

चन्द्रकिशोर जायसवाल लोक, परिवेश और जीवन के उपेक्षित क्षेत्रों की गहरी समझ रखते हैं। यही वह चीज़ है जो उनकी कहानियों को विश्वसनीय और समाजशास्त्रीय विवेचन के लिहाज से प्रामाणिक बनाती है।

इस संग्रह की शीर्षक कथा में उन्होंने भिखारियों के रहन-सहन, उनकी भावनाओं, इच्छाओं और आपस में उनके रिश्तों को अंकित करते हुए मानवीय अनुभवों का एक मार्मिक और यथार्थपरक वितान रचा है।

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 144p
Price ₹250.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1
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Chandrakishore Jaiswal

Author: Chandrakishore Jaiswal

चन्द्रकिशोर जायसवाल

चन्द्रकिशोर जायसवाल का जन्म 15 फरवरी, 1940 को बिहार के मधेपुरा जिले के बिहारीगंज में हुआ। आपने पटना विश्वविद्यालय, पटना से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा हासिल की और अरसे तक अध्यापन करने के बाद भागलपुर अभियंत्रणा महाविद्यालय, भागलपुर से प्राध्यापक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं—‘गवाह गैरहाजिर’, ‘जीबछ का बेटा बुद्ध’, ‘शीर्षक’, ‘चिरंजीव’, ‘माँ’, ‘दाह’ ‘पलटनिया’, ‘सात फेरे’, ‘मणिग्राम’, ‘भट्ठा’, ‘दुखग्राम’ (उपन्यास); ‘मैं नहिं माखन खायो’, ‘मर गया दीपनाथ’, ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’, ‘जंग’, ‘नकबेसर कागा ले भागा’, ‘दुखिया दास कबीर’, ‘किताब में लिखा है’, ‘आघातपुष्प’, ‘तर्पण’, ‘जमीन’, ‘खट्टे नहीं अंगूर’, ‘हम आजाद हो गए!’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘शृंगार’, ‘सिंहासन’, ‘चीर-हरण’, ‘रतजगा’, ‘गृह-प्रवेश’, ‘रंग-भंग’ (नाटक); ‘आज कौन दिन है?’, ‘त्राहिमाम’, ‘शिकस्त’, ‘जबान की बन्दिश’ (एकांकी)।

आप ‘रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान’ (हजारीबाग), ‘बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान’ (आरा), ‘आनन्द सागर कथाक्रम सम्मान’ (लखनऊ), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का ‘साहित्य साधना सम्मान’ (पटना) और बिहार सरकार का जननायक ‘कर्पूरी ठाकुरी सम्मान’ (पटना) से सम्मानित हैं।

आपके उपन्यास ‘गवाह गैरहाजिर’ पर राष्ट्रीय फ़िल्म विकास ​निगम द्वारा निर्मित फ़िल्म ‘रूई का बोझ’ और कहानी ‘हिंगवा घाट में पानी रे!’ पर दूरदर्शन द्वारा निर्मित फ़िल्में काफी चर्चित रही हैं। ‘रूई का बोझ’ नेशनल फ़िल्म फेस्टिवल पैनोरमा (1998) के लिए चयनित हुई थी और अनेक अन्तराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शित हो चुकी है।

ई-मेल : [email protected]

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