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Krishna Sobti Ki Katha-Yatra-Hard Cover

Author: Nand Bhardwaj
ISBN: 9789360865993
Edition: 2026
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
Special Price ₹675.75 Regular Price ₹795.00
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हिन्दी कथा-साहित्य में नारी चेतना के उन्मेष और स्त्री-अस्मिता के सन्दर्भ में जिन कथाकारों की प्रभावशाली भूमिका रही, उनमें कृष्णा सोबती का नाम बहुत आदर से लिया जाता है। वे इस अर्थ में भी विशिष्ट हैं कि उनका कथा-साहित्य स्त्री-अस्मिता से जुड़े सवालों से जूझने की नई दृष्टि और ऊर्जा देता है। उनके स्त्री-चरित्र जहाँ समाज की रूढ़ मान्यताओं, सड़े-गले क़ायदों और असंगत तौर-तरीक़ों को चुनौती देते हैं, वहीं अपनी सहज स्वतंत्रता के पक्ष में ऐसे सवाल भी खड़े करते हैं, जिनसे स्त्री के लोकतांत्रिक अधिकारों की हिमायत के साथ मानवीय सरोकारों का एक व्यापक धरातल निर्मित होता है।

‘कृष्णा सोबती की कथा-यात्रा’ पर केन्द्रित यह आलोचना कृति इस बात को विशेष रूप से रेखांकित करती है कि कृष्णाजी के रचनाकर्म को किसी ऐतिहासिक काल-खंड, भौगोलिक दायरों या सामयिक जीवन-यथार्थ के किन्हीं खास विषयों तक सीमित नहीं किया जा सकता। उनके कथा-साहित्य में हमारे समय-समाज की वास्तविकताओं और कमजोर होते पारिवारिक संबंधों के बीच स्त्री के साथ बढ़ते अमानवीय बरताव के विरुद्ध स्त्री-रचनाशीलता का जो संघर्ष उभरकर सामने आया है, वह स्त्री की भूमिका को और प्रभावशाली बनाता है।

उनके उपन्यासों में ‘डार से बिछुड़ी’ की पाशो, ‘मित्रो मरजानी’ की मित्रो, ‘सूरजमुखी अँधेरे के’ की रतिका, ‘तिन पहाड़’ की जया, ‘ज़िन्दगीनामा’ की शाहनी, चाची महरी और बिन्द्रा, ‘दिलो-दानिश’ की महक और छुन्ना, ‘ऐ लड़की’ की अम्मू और उनकी खुद्दार बेटी, ‘समय सरगम’ की आरण्या और उनकी लेखन यात्रा के अन्त में छपी कृति ‘चन्ना’ की कथानायिका चन्ना सरीखे स्त्री-चरित्र आज़ादी के बाद हिन्दी कथा-साहित्य में उभरती स्वायत्त स्त्री की जीती-जागती मिसाल हैं।

‘कृष्णा सोबती की कथा-यात्रा’ में कृष्णा सोबती की इसी संघर्षशील स्वायत्त स्त्री की छवि को उजागर करने का प्रयास किया गया है। 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2026
Edition Year 2026
Pages 192p
Price ₹795.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 2
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Nand Bhardwaj

Author: Nand Bhardwaj

नन्द भारद्वाज

नन्द भारद्वाज हिन्दी और राजस्थानी के कवि, कथाकार, समीक्षक और संस्कृतिकर्मी हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं—अंधार पख और आगै अंधारौ, दौर अर दायरौ, सांम्ही खुलतौ मारग, बदळती सरगम (राजस्थानी); झील पर हावी रात, हरी दूब का सपना, आदिम बस्तियों के बीच, आपसदारी, आवाज़ों के आसपास, संवाद निरन्तर, साहित्य परम्परा, नया रचनाकर्म, संस्कृति जनसंचार और बाज़ार (हिन्दी)। रेत पर नंगे पाँव, तीन बीसी पार, जातरा अर पड़ाव, साहित्य आलोचना री आधारभोम का सम्पादन किया। राजस्थानी साहित्यिक पत्रिका हरावळ का सम्पादन भी किया।

वे राजस्थान साहित्य अकादेमी की कार्यकारिणी के सदस्य, दूरदर्शन पुरस्कार ज्यूरी के सदस्य, जयपुर लिटरेचर फेस्टि‍वल के रीजनल एडवाइजर रहे। 2015 से बिड़ला फाउंडेशन के बिहारी पुरस्कार की चयन समिति के अध्यक्ष रहे। दूरदर्शन केन्द्र जयपुर के वरिष्ठ निदेशक पद से सेवा-निवृत्त हुए।

उन्हें राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा नरोत्तमदास स्वामी गद्य पुरस्कार, मारवाड़ी सम्मेलन, मुम्बई द्वारा सर्वोत्तम साहित्य पुरस्कार, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, दूरदर्शन विशिष्ट सेवा पुरस्कार, के.के. बिड़ला फाउंडेशन के बिहारी पुरस्कार,  सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार तथा राजस्थानी भाषा साहित्य और संस्कृति अकादमी के सूर्यमल्ल मीसण शिखर पुरस्कार  से सम्मानित किया गया।

ई-मेल : [email protected] 

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