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Jeep Par Sawar Illiyan-Paper Back

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9788171783946
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‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ एक ऐसा ‘व्यंग्य-संग्रह’ है जिसकी प्रत्येक रचना में शरद जोशी की पैनी दृष्टि किसी न किसी विसंगति का मार्मिक उद्घाटन करती है और रेखांकित करती है कि शरद जोशी की व्यंग्य-दृष्टि का कहीं कोई जोड़ नहीं है।

वस्तुतः संग्रह की रचनाएँ यह बताने के लिए काफ़ी हैं कि शरद जोशी सतत जागरूक व्यंग्यकार की भूमिका में इसलिए चर्चित हुए कि उनकी नज़र अपने परिवेश पर ही नहीं, अपितु जीवन और समाज की हर छोटी-से-छोटी घटना पर टिकी रहती थी जिसके कारण इस संग्रह की रचनाओं में धर्म, राजनीति, सामाजिक जीवन, व्यक्तिगत आचरण और ऐसा ही बहुत कुछ समाया हुआ है—चकित करता हुआ, चौंकाता हुआ, चुटकी काटता हुआ या गुदगुदाता हुआ।

कम शब्दों में कहें तो शरद जोशी की यह कृति ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ व्यंग्य-विधा की कठिन चुनौतियों को पूरा करती है और व्यंग्य के निकष पर खरा उतरती है। उनके व्यंग्य भ्रष्ट नेताओं की कलई खोलनेवाले तो हैं ही, सामाजिक जीवन और लोकतंत्र की रखवाली भी करते हैं और उनकी व्यंग्य-दृष्टि इतनी पैनी है कि कोई भी विसंगति उससे बिंधे बिना नहीं रह पाती।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1971
Edition Year 2019, Ed. 9th
Pages 159p
Price ₹250.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1
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Sharad Joshi

Author: Sharad Joshi

शरद जोशी

21 मई, 1931 को उज्जैन, मध्य प्रदेश में जन्मे शरद जोशी, होल्कर कॉलेज, इन्दौर के दिनों में ही एक लेखक के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके थे। इन्दौर के ‘नई दुनिया’ अख़बार में ‘परिक्रमा’ कॉलम से उनकी प्रसिद्धि और लेखक के रूप में पहचान बनी। पहली पुस्तक ‘परिक्रमा’ (उन्हीं लेखों का समावेश) 1958 में छपी।

उनके दो व्यंग्य नाटक ‘अन्धों का हाथी’ और ‘एक था गधा उर्फ़ अलादाद ख़ाँ’ आज भी देश-विदेश में मंचित हो रहे हैं।

अन्तिम कॉलम 'प्रतिदिन’ नवभारत टाइम्स में लगातार 7 वर्षों तक छपा।

शरद जी की 21 पुस्तकें छपी हैं—‘परिक्रमा’; ‘किसी बहाने’; ‘रहा किनारे बैठ’; ‘दूसरी सतह’; ‘मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ’; ‘यथासम्भव’; ‘यत्र-तत्र-सर्वत्र’; ‘यथासमय’; ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’; ‘प्रतिदिन’ 3 भागों में; ‘नावक के तीर’; ‘मुद्रिका रहस्य’; ‘झरता नीम शाश्वत थीम’; ‘मैं, मैं और केवल मैं’; ‘शरद जोशी एक यात्रा’ (अन्य लेखकों के विचार, डॉ. शशि मिश्रा); ‘जादू की सरकार’; ‘पिछले दिनों’; ‘दो व्यंग्य नाटक’; ‘राग भोपाली’; ‘नदी में खड़ा कवि’; ‘घाव करे गम्भीर’।

सरकारी पुरस्कारों से बचते रहे। मात्र एक ‘पद्मश्री’ 1990 में उनके खाते में। पीएच.डी. के घोर विरोधी रहे, आज उन पर ही कई पीएच.डी. हो गई हैं।

हिन्दी की पहली कॉमेडी Sitcom सीरियल ‘यह जो है ज़िन्दगी’ लिखने का श्रेय भी। ‘मालगुडी डेज़’ (हिन्दी संवाद), ‘विक्रम और बेताल’, ‘सिंहासन बत्तीसी’, ‘वाह जनाब’, ‘दाने अनार के’, ‘यह दुनिया ग़ज़ब की’ सीरियल्स भी लिखे... और ‘क्षितिज’, ‘गोधूलि’, ‘उत्सव’, ‘उड़ान’, ‘चोरनी’, ‘साँच को आँच नहीं’ और ‘दिल है कि मानता नहीं’ फ़िल्मों के संवाद भी...!

निधन : 5 सितम्बर, 1991

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