Facebook Pixel

Bina Darvaze Ka Makaan-Paper Back

Special Price ₹179.10 Regular Price ₹199.00
10% Off
In stock
SKU
9788171783137
- +
Share:
Codicon

आर्थिक विपन्नता से ग्रस्त किसी युवती को जब जीवन-ज्ञापन के लिए काम करना पड़ता है तो समाज के भूखे भेड़िए उसे ललचाई नज़रों से देखने लगते हैं। लेकिन जब उसकी आर्थिक विपन्नता के साथ उसके पति की शारीरिक निष्क्रियता भी जुड़ जाए, तो उसे सार्वजनिक सम्पत्ति ही समझ लिया जाता है। ‘बिना दरवाज़े का मकान’ की नायिका दीपा निम्न वर्ग की एक ऐसी ही अभिशप्त युवती है जो जीविकोपार्जन के साथ-साथ अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष कर रही है। उसकी जीवन-प्रक्रिया तथा संघर्ष के क्रम में सम्भ्रान्त बेनक़ाब होता जाता है और दो समाज आमने-सामने तने हुए दिखाई पड़ते हैं। दिल्ली की एक भरी-पूरी कॉलोनी की पृष्ठभूमि पर आधारित कथा कभी-कभी गाँव की ओर भी चली जाती है और तब विडम्बना एकदम गहरा जाती है। दर्द और यातना के गहरे प्रसार के बीच जिजीविषा एवं संघर्ष से उत्पन्न मूल्य-चेतना उपन्यास को और सशक्त बनाती है।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1994
Edition Year 2020, Ed 3rd
Pages 136p
Price ₹199.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 17.5 X 12 X 1
Write Your Own Review
You're reviewing:Bina Darvaze Ka Makaan-Paper Back
Your Rating
Ramdarash Mishra

Author: Ramdarash Mishra

रामदरश मिश्र

रामदरश मिश्र का जन्म 15 अगस्त, 1924 को जिला गोरखपुर, उत्तर प्रदेश के डुमरी गाँव में हुआ। आपने एम.ए., पी-एच.डी. की डिग्री हािसल की। आप लम्बे समय तक अध्यापन से जुड़े रहे और दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रोफेसर के रूप में सेवानिवृत्त हुए।

आपकी प्रकाशित रचनाएँ हैं—‘पथ के गीत’, ‘बैरंग बेनाम चििट्ठयाँ’, ‘पक गई है धूप’, ‘कंधे पर सूरज’, ‘दिन एक नदी बन गया’, ‘जुलूस कहाँ जा रहा है’, ‘आग कुछ नहीं बोलती’, ‘बारिश में भीगते बच्चे’, ‘आम के पत्ते’, ‘कभी कभी इन दिनों’, ‘मैं तो यहाँ हूँ’, ‘रात सपने में’, ‘मैं तो यहाँ हूँ’, ‘समवेत’ सहित दो दर्जन काव्य कृतियाँ; ‘बाज़ार को निकले हैं लोग’, ‘हँसी ओठ पर आँखें नम हैं’ सहित कई ग़ज़ल-संग्रह; ‘पानी के प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’, ‘सूखता हुआ तालाब’, ‘रात का सफर’, ‘अपने लोग’, ‘आकाश की छत’, ‘आदिम राग’, ‘बिना दरवाजे का मकान’, ‘दूसरा घर’ सहित डेढ़ दर्जन उपन्यास; ‘खाली घर’, ‘एक वह’, ‘बसंत का एक दिन’, ‘आज का दिन भी’, ‘एक कहानी लगातार’, ‘फिर कब आएँगे?’, ‘अकेला मकान’, ‘विदूषक’, ‘आखिरी चिट्ठी’ सहित दो दर्जन कहानी-संग्रह; ‘कितने बजे हैं’, ‘बबूल और कैक्टस’, ‘घर-परिवेश’, ‘नया चौराहा’, ‘लौट आया हूँ मेरे देश’ (निबन्ध चयन); ‘तना हुआ इंद्रधनुष’, ‘भोर का सपना’, ‘पड़ोस की खुशबू’, ‘घर से घर तक’ (यात्रा-वृत्तांत); ‘स्मृतियों के छंद’, ‘सर्जना ही बड़ा सत्य है’ सहित कई संस्मरणात्मक कृतियाँ; सहचर है समय (आत्मकथा); ‘आस-पास’, ‘बाहर-भीतर’, ‘विश्वास जिन्दा है’, ‘अपना कमरा’ (डायरी); चौदह खंडों में रचनावली का प्रकाशन, आलोचना की ग्यारह पुस्तकें। कई चयन-संचयन।

आप ‘भारत भारती’, ‘साहित्य अकादेमी’, ‘दयावती मोदी कवि शेखर पुरस्कार’, ‘शलाका सम्मान’, ‘व्यास सम्मान’, ‘सरस्वती सम्मान’ सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हैं।

निधन : 31 अक्टूबर, 2025

Read More
Books by this Author
New Releases
Back to Top