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Arkadipt-Hard Cover

Author: Usha Priyamvada
ISBN: 9788119028450
Edition: 2023, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
Special Price ₹845.75 Regular Price ₹995.00
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अर्कदीप्त अपने आप में डूबा, बहुत थोड़े में सन्तुष्ट, और जीवन को नितान्त अपनी दृष्टि से देखनेवाला बच्चा था; जिसे कुछ नहीं चाहिए था, जो मिलता उसी में सन्तुष्ट।

फिर उसके जीवन में प्रेम आया, जिसने उसके अन्तस को उस ऊर्जा से भरना शुरू किया; जो उसके अस्तित्व की वास्तविक ज़रूरत थी। पूर्ण प्रेम, अकुंठ समर्पण, सर्वांग साहचर्य। सौदामिनी और अर्कदीप्त ने परदेसी भूमि के मुक्त वातावरण में एक दूसरे के मन, आत्मा और देह में वह स्थान पाया जो नियति ने उन्हें उपहार की तरह दिया था। लेकिन सौदामिनी जब अपने अतीत से उत्पन्न कमिटमेंट फ़ोबिया के चलते कुछ पल अज्ञात में विलीन हुई; तो अर्कदीप्त अपने इस पहले प्रेम की टूटन से बिखरा, जला और फिर राख हो गया जिसे परिवार और शुभचिन्तकों ने परम्परा को सौंप दिया। लेकिन उसने दुख के सूरज को बुझने नहीं दिया, उसे अपनी आत्मा के क्षितिज पर अक्षुण्ण रहने दिया और फिर, जैसे ब्रह्मांड के आदेश पर, उसे अपनी खोई दिशा के संकेत मिलने लगे, और वह सब कुछ जहाँ का तहाँ छोड़कर चला गया; सबके लिए विलुप्त।

यह वरिष्ठ कथाकार उषा प्रियम्वदा का नया उपन्यास है। जीवन के सूक्ष्मतम विवरणों से समृद्ध और उन्हीं के बीच आत्मोपल‍ब्धि‍ के निर्णायक पलों को रेखांकित करती हुई एक समर्थ, परिपक्व लेखनी की रचना। यहाँ उपन्यास विधा अपने पूरेपन में घटित होती प्रतीत होती है। भाषा के उदार और सजीव विस्तार में कथा को अपने सम्पूर्ण में खुलने का अवकाश देती हुई। भारत, जर्मनी, डेनमार्क और अमेरिका के कई शहरों में फैली यह कथा प्रेम के विराट को उद्घाटित करती है और अनेकानेक पात्रों के माध्यम से जीवन के तमाम पहलुओं से होकर गुज़रती है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2023
Edition Year 2023, Ed. 1st
Pages 312p
Price ₹995.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2.5
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Usha Priyamvada

Author: Usha Priyamvada

उषा प्रियम्वदा

शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में पीएच.डी., इंडियाना यूनिवर्सिटी, ब्लूमिंगटन, अमेरिका में तुलनात्मक साहित्य में दो वर्ष पोस्ट-डॉक्टरल शोध। अध्यापन के प्रथम तीन वर्ष दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में, तदुपरान्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दो वर्ष में सम्पन्न करके, विस्कांसिन विश्वविद्यालय मेडिसन के दक्षिण एशियाई विभाग में प्रोफ़ेसर रहीं। हिन्दी और अंग्रेज़ी, दोनों ही भाषाओं में समान रूप से दक्ष उषा प्रियम्वदा ने साहित्य सृजन के लिए हिन्दी और समीक्षा, अनुवाद और अन्य बौद्धिक क्षेत्रों के लिए अंग्रेज़ी का चयन किया।

प्रकाशित पुस्तकें : उपन्यास : ‘पचपन खम्भे लाल दीवारें’ (1961), ‘रुकोगी नहीं राधिका’ (1966), ‘शेष यात्रा’ (1984), ‘अन्तर-वंशी’ (2000), ‘भया कबीर उदास’ (2007); कहानी-संग्रह : ‘फिर बसंत आया’ (1961), ‘ज़‍िन्दगी और गुलाब के फूल’ (1961), ‘एक कोई दूसरा’ (1966), ‘कितना बड़ा झूठ’, ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, ‘शून्य एवं अन्य रचनाएँ’, ‘सम्पूर्ण कहानियाँ’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (1997)।

इसके अतिरिक्त भारतीय साहित्य, लोककथा एवं मध्यकालीन भक्ति काव्य पर अनेक लेख जो अंग्रेज़ी में समय-समय पर प्रकाशित हुए। मीराबाई और सूरदास के अंग्रेज़ी अनुवाद ‘साहित्य अकादेमी’, नई दिल्ली ने पुस्तक रूप में प्रकाशित किए। उन्होंने आधुनिक हिन्दी कहानियों के भी अनुवाद किए।

इंडियन स्टडीज विभाग से संलग्न रहते हुए 1977 में उन्हें 'फुल प्रोफ़ेसर ऑफ़ इंडियन लिट्रेचर’ का पद मिला। 2002 में अवकाश लेकर अब पूरा समय लेखन, अध्ययन और बाग़वानी में बिता रही हैं।

 

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