इतिहास, मिथक और वर्तमान समय की स्त्रियों के मूक दुखों को रेखांकित करने वाली ये कविताएँ अनेक ऐसी विडम्बनाओं पर रौशनी डालती हैं जहाँ तमाम सहानुभूति और सम्मान के बावजूद स्त्री के मन को नहीं समझा जाता, भीतर ही भीतर उसे पत्थर बन जाना पड़ता है।
लेकिन ये कविताएँ उस सामर्थ्य को भी रेखांकित करना नहीं भूलतीं जो स्त्री की अपनी सम्पत्ति है, उसका अपना बल, जिसके साथ वह पुरुष-संसार के स्थायी स्त्री-द्वेष से संघर्ष करती है, जीवित रहती है, और आगे बढ़ती है।
पत्थर वह अब भी थी/पर अहल्या नहीं/नीलम बनी पन्ना बनी/माणिक बनी हीरा बनी/शापों की परिधि से दूर/अपना मोक्ष स्वयं बनी।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 128p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 19.5 X 13 X 1 |