Akshat

Poetry
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तुम/मेरी एकमात्र पुस्तक हो/मेरे मन का धर्मग्रन्थ तुम/मेरी एकमात्र कविता हो/मेरे सृजन के सच्चे दस्तावेज़ तुम/मेरा एकमात्र विश्वास हो/मेरी आत्मा के वास्तविक सहचर…’ प्रेम का यही अकुंठ भाव इन कविताओं का मूल स्वर है। यह प्रेम-कविताओं का संग्रह है जिनकी कमी इधर आकर बहुत खलने लगी है। कविता के केन्द्र से प्रेम का हटना बेशक जीवन का अनुगमन ही है, क्योंकि जीवन का केन्द्र भी आज प्रेम नहीं है, लेकिन इसीलिए प्रेम अपनी तमाम पारदर्शिताओं, स्वच्छताओं और उदात्तताओं के साथ और भी ज़रूरी हो जाता है। वह एक अमूर्त भाव है लेकिन दुनिया में उसका अभाव हमें किसी चीज़ की तरह कचोटता है, जिसे इतनी तमाम चीज़ों की उपस्थिति भी पूर नहीं पाती।

ये कविताएँ हमें प्रेम की याद दिलाती हैं, उसकी उस ताक़त की याद दिलाती हैं जो हमें देह में देह को और आत्मा में आत्मा को अनुभव करने की क्षमता देता है, हमें ज्‍़यादा सहनशील, सहिष्णु और संसार को ज्‍़यादा रहने लायक़ बनाता है।

तुम/मेरे पास/सुख की तरह हो/जैसे जड़ों के पास ज़मीन/तुम्हारा स्पर्श मुझे छूता है/जैसे सूरज छूता है पृथ्वी।

 

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2002
Edition Year 2002, Ed. 1st
Pages 130p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2
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Editorial Review

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Pushpita Awasthi

Author: Pushpita Awasthi

प्रो. पुष्पिता अवस्थी

जन्म : कानपुर, उत्तर प्रदेश (भारत)। राष्ट्रीयता : नीदरलैंड।

शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी) व शोध (आधुनिक काव्यालोचन की भाषा)।

2001-2005 तक सूरीनाम स्थित भारतीय राजदूतावास की प्रथम सचिव एवं ‘भारतीय संस्कृति केन्द्र’, पारामारिबो में हिन्दी प्रोफ़ेसर। इसके पूर्व बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बसंत कॉलेज फ़ॉर वुमेन में हिन्दी विभागाध्यक्ष। 2006 से नीदरलैंड स्थित ‘हिन्दी यूनिवर्स फ़ाउंडेशन’ की निदेशक। 2010 में गठित ‘अन्तरराष्ट्रीय भारतवंशी सांस्कृतिक परिषद’ की महासचिव।

प्रकाशन व प्रसारण : ‘गोखरू’, ‘जन्म’ (कहानी-संग्रह); ‘अक्षत’, ‘शब्द बनकर रहती हैं ऋतुएँ’, ‘ईश्वराशीष’, ‘हृदय की हथेली’, ‘अन्तर्ध्वनि’, ‘देववृक्ष’, ‘शैल प्रतिमाओं से’ (कविता-संग्रह); ‘आधुनिक हिन्दी काव्यालोचना के सौ वर्ष’ (आलोचना); ‘संस्कृति,  भाषा और साहित्य’ (प्रो. विद्यानिवास मिश्र से साक्षात्कार); ‘श्रीलंका वार्ताएँ’, ‘स्कूलों के नाम पत्र’—भाग 2 (जे. कृष्णमूर्ति), ‘काँच का बक्सा’ (नीदरलैंड की परीकथाएँ) (अनुवाद); ‘कविता सूरीनाम’, ‘कथा सूरीनाम’, ‘दोस्ती की चाह के बाद’, ‘जीत नराइन की कविताएँ’, ‘दादा धर्माधिकारी की सूक्तियाँ’; ‘सर्वोदय दैनन्दिनी’; ‘परिसंवाद’ (कृष्णमूर्ति के दर्शन पर आधारित त्रैमासिक), ‘सर्वोदय’ (सम्पादन)। सूरीनाम में ‘हिन्दीनामा’ और ‘शब्द शक्ति’ पत्रिकाओं के प्रकाशन की शुरुआत व अतिथि सम्‍पादन।

सूरीनाम में ‘हिन्दीनामा प्रकाशन संस्थान’ तथा ‘साहित्य मित्र’ संस्था की स्थापना।

सम्मान व पुरस्कार : ‘भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थान’ द्वारा कविता के लिए पुरस्कृत (1987), अन्तरराष्ट्रीय ‘अज्ञेय साहित्य सम्मान’ (2002), ‘सूरीनाम  राष्ट्रीय  हिन्दी सेवा पुरस्कार’ (2002), कविता के लिए ‘शमशेर सम्मान’ (2008)।  

बांग्ला, फ़्रेंच, हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेज़ी व डच भाषाओं की जानकार प्रो. पुष्पिता अवस्‍थी ‘एनसीईआरटी’ में पाठ्यक्रम निर्धारण समिति की सदस्य भी रही हैं।

 

सम्‍प्रति : निदेशक—‘हिन्दी यूनिवर्स फ़ाउंडेशन’, नीदरलैंड।

 

सम्‍पर्क : pushpita.awasthi@bkkvastgoed.nl, pushpita.awasthi@hindiuniverse.com, http://pushpitaawasthi.blogspot.in

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