‘संगत : विश्वनाथ त्रिपाठी’ किताब नहीं, किताब के रूप में हमारे गुरु डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी स्वयं हैं। एक देह में, एक चेतना में ब्रह्मांड कैसे व्याप्त रहता है और जब वह सर्जनात्मक वाणी में प्रवाहित होता है तो उसका रूप कैसा होता है—यह किताब इसका उदाहरण है। इसमें गुरुजी एक साथ अनेक रूपों में हैं, पर वे अनेक रूपों में विभक्त नहीं, ‘मिलिन्दप्रश्न’ के अविभाज्य रथ की तरह हैं। इसमें परिवार, साहित्यिक परिवार, कविता-कहानी-नाटक-उपन्यास-गद्य-आलोचना, समाज, राष्ट्रीयता, अन्तरराष्ट्रीयता, प्रकृति, संगीत, भोजन आदि के संयोग से बना एक नया सांस्कृतिक रस है। यहाँ देशकाल की परिधि को लाँघ जानेवाली स्मृति भी है और वर्तमानता का अच्छा-बुरा, देशकाल के शर से बिद्ध रूप भी।
इस किताब को पढ़ने के बाद कहा जा सकता है कि गुरुजी का भावलोक अपने समय का मानवीय अविरोधी संसार है, जिसमें जीवन के सौन्दर्य का खुलकर स्वीकार है, सौन्दर्य के साथ सुन्दरता की यातना का बोध है, मिथकों के भीतरी अर्थ को निचोड़ ले आने की क्षमता है, निरन्तर विकसित होती नैतिकता की पक्षधरता है और गम्भीर से गम्भीर विषय को बातों ही बातों में समझा देने की विशेषता है।
—वेद प्रकाश
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2026 |
| Edition Year | 2026, Ed. 1st |
| Pages | 190p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 21.5 X 14 X 1.5 |