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Vijeta-Hard Cover

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‘विजेता’ और इसकी अगली कड़ी ‘तूफ़ान झुका सकता नहीं’ नामक उपन्यासों में उज्बेकिस्तान के एक ग्राम-सोवियत की जनता को एकजुट सामूहिक श्रम और सामूहिक मेधा एवं कौशल से, ख़ाली पड़ी धरती को खेती योग्य बनाते हुए, क्रान्तिविरोधी बसमाचियों द्वारा बन्द कर दिए गए कोकबुलाक चश्मे के उद्गम को खोजकर उसे फिर से चालू करते हुए और सामूहिक फ़ार्मों के उत्पादन को तरह-तरह से आगे बढ़ाते हुए विस्तार से चित्रित किया गया है।

आर्थिक सम्बन्धों के रूपान्तरण के साथ ही जो नई सामाजिक-सांस्कृतिक-नैतिक-सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्य-मान्यताएँ, सम्बन्ध और संस्थाएँ अस्तित्व में आ रही थीं तथा नए-पुराने के बीच जो संघर्ष अविराम जारी था, उसका लेखक ने विश्वसनीय और जीवन्त चित्र उपस्थित किया है। कथा के फलक पर पार्टी और प्रशासकीय मशीनरी की वह नौकरशाही भी मौजूद है। क्रान्ति-पूर्व समाज के अवशेष कुछ षड्यंत्रकारी विध्वंसक तत्त्व भी मौजूद हैं जो पुरानी पीढ़ी के कुछ लोगों की रूढ़िवादिता और नौकरशाही की हठधर्मिता का लाभ उठाकर सार्वजनिक सम्पत्ति और समाजवाद को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते हैं।

पुराने मूल्यों और रूढ़ियों से चिपके कुछ पुराने लोग भी हैं जो धीरे-धीरे बदलते हैं। लेकिन नए और पुराने के बीच का संघर्ष लगातार चलता रहता है। इन सभी प्रवृत्तियों की पारस्परिक अन्तर्क्रिया और संघात के रूप में आगे बढ़ते घटना-क्रम के बीच से नई दुनिया के उन नए नायकों के उदात्त, मानवीय चरित्र उभरते हैं जो पूँजी की संस्कृति के बरअक्स श्रम की संस्कृति की नुमाइंदगी करते हैं।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Editor Not Selected
Isbn 10 8126704365
Publication Year 2002
Edition Year 2002, Ed. 1st
Pages 323p
Price ₹395.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2.5
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Sharaf Rashidov

Author: Sharaf Rashidov

शराफ़ रशीदोविच

जन्म : 6 नवम्बर, (पुराने कैलेंडर के अनुसार 24 अक्टूबर), 1917; झिजाक, उज़्बेकिस्तान।

अक्टूबर क्रान्ति और उज़्बेक सोवियत गणराज्य की स्थापना के बाद उज़्बेक भूस्वामियों के बर्बर प्रभुत्व के ख़ात्मे, कृषि और उद्योग के विकास, सांस्कृतिक परिवर्तनों और स्त्रियों की मुक्ति जैसी समाजवाद की उपलब्धियों से तथा समाजवादी शिक्षा के प्रभाव में शराफ़ रशीदोव

कम्युनिज़्म की ओर आकृष्ट हुए। 1939 में वे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने। किसान परिवार में पैदा हुए रशीदोव ने समरकन्द स्थित उज़्बेक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय से 1941 में भाषाविज्ञान में स्नातक उपाधि हासिल की। इसके पूर्व 1935 से ही वे एक माध्यमिक विद्यालय में अध्यापक थे। 1937 से 1941 तक वे समरकन्द से प्रकाशित होनेवाले एक पार्टी अख़बार के सम्पादन से जुड़े रहे। 1941-42 के दौरान सोवियत सेना में शामिल होकर उन्होंने महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध में हिस्सा लिया।

1950 और 1959 में वे उज़्बेकिस्तान की सुप्रीम सोवियत के अध्यक्ष-मंडल के अध्यक्ष और सोवियत संघ की सुप्रीम सोवियत के अध्यक्ष-मंडल के उपाध्यक्ष चुने गए। मार्च, 1959 में

वे उज़्बेकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमेटी के प्रथम सचिव चुने गए। इस पद पर वे 1983 में अपनी मृत्यु के समय तक क़ाबिज़ रहे। इसके अतिरिक्त वे अनेक राजकीय एवं पार्टी पदों पर रहे।

रशीदोव की पहली पुस्तक 1945 में प्रकाशित एक कविता-संग्रह था। ‘विजेता’ उपन्यास 1951 में प्रकाशित हुआ। ‘विजेता’ की ही कहानी को और अधिक व्यापक विस्तार देते हुए उन्होंने अगला उपन्यास लिखा ‘तूफ़ान झुका सकता नहीं’ जो 1958 में प्रकाशित हुआ। उनका तीसरा उपन्यास ‘प्रचंड लहर’ 1964 में प्रकाशित हुआ जो फासीवाद-विरोधी देशभक्तिपूर्ण युद्ध के दौरान घरेलू मोर्चे पर सोवियत जनता के शीर्यपूर्ण संघर्ष को समर्पित है। 1956 में उनकी एक उपन्यासिका ‘कश्मीर का गीत' भी प्रकाशित हुई थी, जिसमें भारतीय जनता के मुक्ति संघर्ष का प्रसंग है। इसके अतिरिक्त उन्होंने समकालीन सोवियत साहित्य पर कुछ आलोचनात्मक लेख लिखे और भारी तादाद में राजनीतिक लेखन किया।

निधन : 1983; ताशकन्द।

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