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Urdu Ki Aakhiree Kitab-Hard Cover

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9788126703265
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उर्दू में तेज़ निगारी (व्यंग्य) के जो बेहतरीन उदाहरण मौजूद हैं, उनमें इब्ने इंशा का अन्दाज़ सबसे अलहदा और प्रभाव में कहीं ज़्यादा तीक्ष्ण है। इसका कारण है उनकी यथार्थपरकता, उनकी स्वाभाविकता और उनकी बेतकल्लुफ़ी। उर्दू की आख़िरी किताब उनकी इन सभी ख़ूबियों का मुजस्सिम नमूना है।

...यह किताब पाठ्य-पुस्तक शैली में लिखी गई है और इसमें भूगोल, इतिहास, व्याकरण, गणित, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों पर व्यंग्यात्मक पाठ तथा प्रश्नावलियाँ दी गई हैं। इस ‘आख़िरी किताब’ जुम्ले में भी व्यंग्य है कि छात्रों को जिससे विद्यारम्भ कराया जाता है, वह प्राय: ‘पहली किताब’ होती है और यह ‘आख़िरी किताब’ है। इंशा का व्यंग्य यहीं से शुरू होता है और शब्द-ब-शब्द तीव्र होता चला जाता है।

इंशा के व्यंग्य में यहाँ जिन चीज़ों को लेकर चिढ़ दिखाई पड़ती है, वे छोटी-मोटी चीज़ें नहीं हैं। मसलन—विभाजन, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की अवधारणा, क़ायदे-आज़म जिन्ना, मुस्लिम बादशाहों का शासन, आज़ादी का छद्म, शिक्षा-व्यवस्था, थोथी नैतिकता, भ्रष्ट राजनीति आदि। और अपनी सारी चिढ़ को वे बहुत गहन-गम्भीर ढंग से व्यंग्य में ढालते हैं—इस तरह कि पाठक को लज़्ज़त भी मिले और लेखक की चिढ़ में वह ख़ुद को शामिल भी महसूस करे।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1988
Edition Year 2024, Ed. 5th
Pages 155p
Price ₹495.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 18.5 X 13 X 1.5
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Ibne Insha

Author: Ibne Insha

इब्ने इंशा

जन्म :  सन् 1927 का कोई महीना।

जन्म-स्थान : लुधियाना (पंजाब)। प्रारम्भिक शिक्षा लुधियाना में ही। बाद में पाकिस्तान बनने के बाद ‘पाकिस्तानी’ बनना पड़ा। 1949 में कराची आ बसे, वहीं उर्दू कॉलेज से बी.ए. किया।

माँ-बाप का दिया नाम शेर मोहम्मद ख़ाँ, लेकिन कमसिनी में ही स्वयं को इब्ने इंशा कहना और लिखना शुरू कर दिया और अन्तत: यही नाम असली हुआ।

उर्दू के प्रख्यात कवि और व्यंग्यकार। लहज़े में मीर की ख़स्तगी और नज़ीर की फ़क़ीरी। आजीवन दुनिया-भर में घूमते रहे। समाज के सुख-दु:ख से गहरा रिश्ता रखते हुए मनुष्य की स्वाधीनता और स्वाभिमान के प्रबल पक्षधर रचनाकार। हिन्दी भाषा के अच्छे जानकार थे। उर्दू-रचनाओं में हिन्दी में ख़ूबसूरत प्रयोगों की भरमार है। हिन्दी-ज्ञान के बल पर ही शुरू में ऑल इंडिया रेडियो पर काम किया। बाद में कौमी किताब घर के निदेशक, इंग्लैंड स्थित पाकिस्तानी दूतावास में सांस्कृतिक मंत्री और फिर पाकिस्तान में यूनेस्को के प्रतिनिधि रहे।

प्रमुख पुस्तकें : ‘उर्दू की आख़िरी किताब’ (व्यंग्य-संग्रह); ‘चाँदनगर’, ‘इस बस्ती के इस कूचे में’ (कविता-संग्रह); ‘बिल्लू का बस्ता’, ‘यह बच्चा किसका बच्चा है’ (बाल-कविताएँ)।

निधन : 11 जनवरी, 1978 को लंदन में कैंसर से मृत्यु।

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