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Toofanon Ke Beech-Paper Back

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9788183615372
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‘तूफानों के बीच’ रांगेय राघव का मार्मिक रिपोर्ताज है। अपनी विशिष्ट वर्णन शैली और व्यापक मानवीय सरोकारों के चलते यह रचना अत्यन्त हृदयग्राही सिद्ध हुई है। रांगेय राघव ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है, ‘बंगाल का अकाल मानवता के इतिहास का बहुत बड़ा कलंक है। शायद क्लियोपेट्रा भी धन के वैभव और साम्राज्य की लिप्सा में अपने ग़ुलामों को इतना भीषण दुख नहीं दे सकीं, जितना आज एक साम्राज्य और अपने ही देश के पूँजीवाद ने बंगाल के करोड़ों आदमी, औरतों और बच्चों को भूखा मारकर दिया है। आगरे के सैकड़ों मनुष्यों ने दान नहीं, अपना कर्तव्य समझकर एक मेडिकल जत्था बंगाल भेजा था। जनता के इन प्रतिनिधियों को बंगाल की जनता ने ही नहीं, वरन् मंत्रिमंडल के सदस्यों तक ने धन्यवाद दिया था। किन्तु मैं जनता से स्फूर्ति पाकर यह सब लिख सका हूँ। मैंने यह सब आँखों-देखा लिखा है।’ एक पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक।

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Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2012
Edition Year 2025, Ed. 2nd
Pages 96p
Price ₹250.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 21 X 13.5 X 0.5
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Rangeya Raghav

Author: Rangeya Raghav

रांगेय राघव

रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी, 1923 को आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका मूल नाम टी.एन.वी. आचार्य—तिरुमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य था। उन्होंने सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा से 1944 में स्नातकोत्तर और 1949 में आगरा विश्वविद्यालय से ‘गुरु गोरखनाथ और उनका युग’ विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। हिन्दी, अंग्रेजी, ब्रज और संस्कृत पर उनका असाधारण अधिकार था। 13 वर्ष की छोटी आयु में ही लिखना शुरू किया। 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद ‘तूफानों के बीच’ नाम से एक बहुचर्चित रिपोर्ताज लिखा। उन्हें चालीस साल से भी कम उम्र मिली इसके बावजूद कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, संस्कृति और सभ्यता पर जमकर काम किया और कुल मिलाकर 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने भारतेन्दु, कबीर, तुलसी, कृष्ण, बुद्ध, विद्यापति, गोरखनाथ और बिहारी जैसे रचनाकारों और व्यक्तित्वों को केन्द्र में रखकर कई रचनाएँ लिखीं। ‘मुर्दों का टीला’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘सीधा-सादा रास्ता’, ‘लोई का ताना’, ‘साम्राज्य का वैभव’ तथा ‘प्रगतिशील साहित्य के मापदंड’ उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। अंग्रेजी और संस्कृत से बड़ी संख्या में अनुवाद भी किया। उन्हें ‘हिन्दुस्तानी अकादमी पुस्कार’, ‘डालमिया पुरस्कार’, ‘उत्तर प्रदेश शासन पुरस्कार’ और मरणोपरान्त ‘महात्मा गांधी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। 12 सितम्बर, 1962 को बम्बई में उनका निधन हुआ। 

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