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Tareekh Hamein Saath Liye Jaatee Hai-Paper Back

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कविता अन्ततः एक भाषिक संरचना है। शब्दों को बरतने की कला है। लय और संरचना उसके अनिवार्य तत्व हैं। समकालीन भारतीय राजनीति की शिकार सिर्फ़ मनुष्यता ही नहीं हमारी भाषा भी हुई है। वो भाषा जो अमीर ख़ुसरो, ग़ालिब, मीर, रहीम से लेकर मुक्तिबोध की सृजनात्मकता से गुज़रकर हमें प्राप्त हुई।

हरिओम की कविताएँ भाषा का एक खोया हुआ आत्मीय संसार गोया हमे वापिस सौंपती हैं। उनके लेखन में एक स्वाभाविक लय है जो अपनी सहजता से हमें चकित करती है। इसे एक लम्बे अभ्यास के बिना प्राप्त करना असम्भव है। कहीं-कहीं नए शब्दों को शामिल करते हुए अनायास ही वे भाषा की न सिर्फ़ पुनर्रचना करते प्रतीत होते हैं; बल्कि उसे नया संस्कार भी देते हैं।

और हम सदियाँ बिताकर आ गए थे जैसे लम्हों में—वाक्य ऐसे लगते हैं जैसे किसी शेर का पूरा मिसरा हों। भूख से नहीं मरता कोई—जैसा यांत्रिक, संवेदनहीन अहम्मन्य वाक्य जैसे किसी ग़ैरज़िम्मेदार तानाशाह का प्रतीक बन जाता है। अपने समय और समाज की गहरी चिन्ता और एहसास के बावजूद इस संग्रह की मुख्य थीम प्रेम है। वे कहते हैं—वक़्त ने जगह को ऐसे घेर रखा है/जैसे मेरी बाँहों ने तुम्हें।

वक़्त और जगह याद करिए—Time & Space—आइंस्टाइन ने जब समय को स्थान का अनिवार्य चौथा आयाम बताया था तो वैज्ञानिकों को ये समझने में कुछ समय लगा था। किन्तु प्रेम की अनुभूति के बरक्स समय और स्थान के युग्म को हरिओम इस सहजता से लाकर रख देते हैं कि हमें ये बोध ही नहीं होता कि उनकी बाँहों में समय है। और उनकी प्रेमिका जिसे वे ‘तुम’ कहकर सम्बोधित कर रहें हैं—वो जगह है, वो पृथ्वी है, वो अन्तरिक्ष है। जिसका समय से मुक्त होना असम्भव है बल्कि अस्तित्व भी असम्भव है।

हरिओम युवा हैं। अपने शब्दों को यक़ीन के साथ स्वर देते हैं और लय पर उनका अधिकार है। तारीख़ हमें साथ लिये जाती है  संग्रह में इसके अलावा भी बहुत कुछ है और जो नहीं है वो अगली रचनाओं में और ताक़त के साथ आएगा।

इस यक़ीन के साथ शुभकामनाओं सहित...

—नरेश सक्सेना

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 144p
Price ₹250.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1
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Hariom

Author: Hariom

हरिओम

हरिओम की उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हुई। गढ़वाल विश्वविद्यालय, उत्तराखंड से कृष्णा सोबती के उपन्यासों पर पी-एच.डी. की उपाधि ली। अन्तरराष्ट्रीय सामाजिक अध्ययन संस्थान, हेग, नीदरलैंड से गवर्नेंस, पब्लिक पॉलिसी एंड पोलिटिकल इकॉनामी में दुबारा एम.ए. किया।

‘धूप का परचम’, ‘ख़्वाबों की हँसी’ और ‘मैं कोई एक रास्ता’ (ग़ज़ल-संग्रह); ‘अमरीका मेरी जान’ और ‘तितलियों का शोर’ (कहानी-संग्रह); ‘कपास के अगले मौसम में’ (कविता-संग्रह) उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा पर लिखा यात्रा-वृत्तांत ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा : आस्था के वैचारिक आयाम’ बेहद चर्चित रहा है और इसका अंग्रेज़ी संस्करण भी आ चुका है। ‘रीथिंकिंग द रोल ऑफ़ इनफ़ार्मेशन, एजुकेशन एंड कम्युनिकेशन इन पार्टिसिपेटरी रूरल सैनिटेशन इन उत्तर प्रदेश असेसिंग पॉसिबल पॉलिसी लेसंस फ्रॉम बांग्लादेश’ विषयक शोध-कार्य यूनीसेफ़ (उत्तर प्रदेश इकाई) और जर्मन के ग्लोब एडिट प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है।

साहित्य के अलावा संगीत में भी उनकी गहरी दिलचस्पी है। ग़ज़ल गायक के रूप में फ़ैज़ की ग़ज़लों का एक एलबम ‘इन्तिसाब’ आ चुका है। दूसरा एलबम ‘रोशनी के पंख’ भी ख़ासा चर्चित रहा। इसके अलावा ‘खनकते ख़्वाब’ और ‘रंग का दरिया’ एल्बम में उन्होंने ख़ुद की लिखी और संगीतबद्ध ग़ज़लें गाई हैं। कई एकल गाने भी गाए। आकाशवाणी नई दिल्ली से उन्हें बतौर गायक ‘ए ग्रेड’ का प्रमाणपत्र मिल चुका है।

उन्हें ‘फ़िराक़ सम्मान’, ‘राजभाषा अवार्ड’, ‘तुलसी श्री सम्मान’ और लंदन की एक संस्था द्वारा ‘वातायन सम्मान’ मिल चुका है।

सम्प्रति : प्रमुख सचिव, समाज कल्याण, लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

ई-मेल : [email protected] 

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