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Taaron Kee Dhool-Paper Back

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तारों की धूल कृष्णमोहन झा का नया कविता-संग्रह है जो उनके पहले संग्रह के लगभग दो दशकों के बाद पाठकों के सामने आ रहा है। उनकी कविता इस दुनिया को स्मृति की दृष्टि से देखती है। इस तथ्य को, कि स्मृति एक भरा-पूरा संसार है, वह इतने गाढ़े रंगों में अंकित करती है कि उसे छुआ जा सके, उसमें रहा जा सके जैसे हम प्रकृति के साथ, उसके बीच उसके तमाम सजीव स्पर्शों के साथ रहते आए हैं।

प्रकृति और मनुष्य का यह साहचर्य उत्तरोत्तर क्षीण हुआ है, यह वह दुख है जो उनकी कविताओं में सतत मौजूद रहता है। उनकी कविता हमें बीते हुए को अपने भीतर सँजोए हुए इस पृथ्वी पर रहना सिखाती है, यह पृथ्वी जहाँ पानी है, हवा है, वनस्पति है, चिड़ियाँ हैं, जुगनू हैं, आकाश और उसमें गुच्छों-के-गुच्छे लटकते तारे हैं, और कविताएँ हैं।

उनकी कविता हमें महसूस कराती है कि इन सबके साथ, उनकी सजीवता को स्वीकार करते हुए मनुष्य ने कैसे रहना शुरू किया होगा, और कैसे हम रह सकते हैं ताकि आगे भी रह सकें। वे एक आठवें दिन की कल्पना करते हैं, एक ऐसा दिन जिस पर न ख़ून का एक छींटा हो, न आँसू का कोई निशान।

जिस चीज़ को ये कविताएँ क़तई महिमामंडित नहीं करतीं, वह है आगे-ही-आगे चलते चले जाना, और वह भी उसी महापथ से जहाँ विस्मरण हमारी तमाम अकृतज्ञताओं और अमनुष्यताओं को कवच की तरह ढके रहता है।

ये हमें याद दिलाती हैं, और आज के समय में यह एक बड़ा कार्यभार है, जिसे ये कविताएँ अपनी आन्तरिक ज़िद और बाह्य शिल्प, दोनों से जैसे शपथपूर्वक करती हैं।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 152p
Price ₹250.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1
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Krishna Mohan Jha

Author: Krishna Mohan Jha

कृष्णमोहन झा

कृष्णमोहन झा का जन्म 10 अगस्त, 1968 को उत्तरी बिहार के सहरसा जिले के जीतपुर गाँव में हुआ। उन्होंने उच्च शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से प्राप्त की है। द्विभाषी कवि हैं। हिन्दी में ‘समय को चीरकर’ (1998), ‘तारों की धूल’ (2025) और मैथिली में ‘एकटा हेरायल दुनिया’ (2008) उनके प्रकाशित कविता-संग्रह हैं। उन्होंने विद्यापति के गीतों के एक संचयन ‘भनइ विद्यापति’ (2014) का सम्पादन किया है। ‘प्रतिलिपि’ और ‘इंडियन लिटरेचर’ में उनकी कई कविताओं के अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हैं। हिन्दी कविताओं के अंग्रेज़ी में अनूदित संग्रह ‘होम फ़्रॉम अ डिस्टेंस’ (सं. गिरिराज किराडू, राहुल सोनी) और वैश्विक कविता-संग्रह ‘ग्रीनिंग द अर्थ’ (सं. के. सच्चिदानन्दन, निशि चावला) के एक सहयोगी कवि हैं। असमिया, बांग्ला, मराठी, तेलुगु, उर्दू और नेपाली में भी उनकी कविताएँ अनूदित हैं।

ई-मेल : [email protected]

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