Facebook Pixel

Sulga Hua Raag-Hard Cover

Special Price ₹127.50 Regular Price ₹150.00
15% Off
Out of stock
SKU
9788171198672
Share:
Codicon

हिन्दी कविता का अधिकांश इन दिनों जिस प्रकार की नगरीय मध्यवर्गीयता से आक्रान्त होकर आत्मदया, हकलाहट, अन्तहीन रुदन और ऐसे ही नाना प्रपंचों को निचुड़े हुए मुहावरों में प्रकट करता दिखता है, उसके बरक्स ‘सुलगा हुआ राग’ में मनोज मेहता की कविताएँ सामर्थ्य भरे विकल्प की तरह आई हैं। इस संग्रह की कविताओं में समकालीन भारतीय समय और विडम्बनाओं से भरे उसके व्यापक यथार्थ की गहरी समझ है और उसी के साथ है उस यथार्थ की संश्लिष्ट संरचना से प्रसंगों, वस्तुओं, पात्रों और उनकी अन्तर्क्रियाओं को अचूक कौशल के साथ उठाकर अपना काव्यलोक रचने की अनूठी सृजनशीलता जो विस्मयकारी ढंग से कविता के सामान्य चलनवाले अतिपरिचित इलाक़ों के पार जाकर हमारे लिए गाँव-क़स्बों के मामूली मनुष्यों की एक विशाल दुनिया खोलती है। यह वह दुनिया है जहाँ ‘ढुलमुल गँवारू झोपड़ों में’ और ‘ढोल, मादल, बाँसुरी के सुरों में हमारा देश बसता है’।

मनोज मेहता के काव्य-सामर्थ्य का एक ग़ौरतलब पहलू यह भी है कि लोकजीवन से उनकी संलग्नता उन्हें अपनी भाषा के अन्य बहुतेरे कवियों की तरह अतिशय रोमानीपन की ओर नहीं धकेलती। ‘सुलगा हुआ राग’ में जहाँ मनोज उपलब्ध जीवन को उत्सवित करते हैं, वहाँ भी उनका काव्य विवेक अपनी वस्तुपरकता को खोकर असन्तुलित नहीं होता और न ही वह अतिरिक्त ऐश्वर्य अर्जित करने के लिए शिल्प की कलावादी तिकड़मों का सहारा लेता है। यह एक ऐसा काव्य-विवेक है जो आवयविक अनुभवों को लेकर बेहद सादगी और धीरज के साथ अपने आशयों को स्पष्ट करता है और भीषण संकटों के मौजूदा दौर में जीवन-प्रसंगों की मानवीय आन्तरिकता को भाषा के आईने में कुछ यों ले आता है कि वह बार-बार अपनी अनोखी आकस्मिकता के नएपन से हमें एक दुर्लभ सौन्दर्यबोध की ज़मीन पर नए आविष्कार की तरह बाँध लेती है—मानो हमारे भीतर पहले कुतूहल और फिर सरोकारों का ख़ूब समृद्ध ताना-बाना निर्मित करती हुई।

‘सुलगा हुआ राग’ की अन्तर्वस्तु में सहज और आयासहीन जनोन्मुख प्रतिबद्धता है, आख्यान है और निरन्तर गूँजती एक लय है जिसमें क्रियाओं और ध्वनियों की आवाजाही और हलचलें शामिल हैं—पर इस सबके बावजूद कुछ भी स्फीत नहीं होता। यहाँ शामिल कविताओं में मनोज मेहता के अनुभव प्रान्तरों की ऐसी अन्तर्यात्रा के साक्ष्य हैं जिनमें हमारे सामूहिक मन की बेचैन दीप्तियाँ तो हैं ही, उसकी अपराजेय जिजीविषा का गान भी है।

‘सुलगा हुआ राग’ के एक से दूसरे छोर तक मनोज मेहता ने चाहे जितने भी स्वरों का संयोजन किया हो, यहाँ न तो कहीं किसी विवादी स्वर का खलल है और न ही कोई मुद्रा दोष।

‘सुलगा हुआ राग’ में यह सब सम्भव हो पाया है तो इसलिए कि इसकी निर्मिति में एक विनम्र किन्तु दृढ़ प्राणवत्ता बसी है।

—पंकज सिंह

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Isbn 10 8171198678
Publication Year 2004
Edition Year 2004, Ed. 1st
Pages 119p
Price ₹150.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
Write Your Own Review
You're reviewing:Sulga Hua Raag-Hard Cover
Your Rating

Author: Manoj Mehta

मनोज मेहता

जन्म : 1964; मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार।

बिहार विश्वविद्यालय से हिन्दी में बी.ए. ऑनर्स और एम.ए.। दिल्ली विश्वविद्यालय से राजकमल चौधरी की लम्बी कविता ‘मुक्ति प्रसंग’ पर एम.फ़ि‍ल्. के लिए शोध-प्रबन्ध।

कमलेश्वर के सम्पादन में ‘दैनिक जागरण’ में उप-सम्पादक रहे और उन्हीं के साथ अख़बार की नीतियों से असहमति के कारण अन्ततः त्यागपत्र दे दिया।

कुछ वर्ष तक दिल्ली में फ़्रीलांस पत्रकार के रूप में काम करने के बाद बिहार लौटकर प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव की हैसियत से सक्रिय रहे। प्रलेस के ग्यारहवें राज्य सम्मेलन के मुख्य संयोजक।

वर्ष 2000 में पुनः दिल्ली आए और ‘राष्ट्रीय सहारा’ में पत्रकारिता आरम्भ की। फिर साप्ताहिक ‘सहारा समय’ से जुड़े।

प्रकाशन : सबसे पहले 1986 में ‘धर्मयुग’ में कविताएँ प्रकाशित हुईं। तब से आज तक हिन्दी की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में गद्य और कविताओं का निरन्तर प्रकाशन। पहला कविता-संग्रह ‘आखेट’ तो दूसरा ‘सुलगा हुआ राग’ शीर्षक से प्रकाशित और चर्चित।

Read More
Books by this Author
New Releases
Back to Top