अमृत आपके लिए नया नाम नहीं है, और न उसका क़लम नया है ।
अमृत ने गद्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा है, और उसी जानदार ढंग से जो कि उसका अपना, खास अपना, हस्ताक्षर है, जो सबसे अलग पहचाना जाता है।
और वह शायद इसीलिए कि अमृत के लिखने में एक नितांत मौलिक व्यक्तित्व है, मर्मस्पशिता है, जो केवल उसकी भाषा या शैली की बात नहीं, उससे ज्यादा गहरे उतर कर उसके संपूर्ण मानसलोक की संर-चना की बात है, एक तरल पारदर्शिता जो उसके हर शब्द को एक नयी-सी दीप्ति दे देती है, एक नयी-सी ताज़गी, एक नयी-सी घुलावट, जो बतलायी नहीं जा सकती, स्वयं रचना का आस्वादन करके ही अनुभव की जा सकती है ।
'क़लम का सिपाही, पहुँचा। आभारी हूँ। लिखने का अधिकारी आपसे बढ़कर कौन होता। प्रेमचंद के पुत्र के नाते ही नहीं, योग्यता के नाते भी ऐसा तटस्थ भाव साधना से ही संभव है। प्रथम अंश पढ़कर ही मैं मुग्ध हो गया। आपका परिश्रम सफल हुआ । हिन्दी को आपने यह एक रत्न प्रदान किया है।
- मैथिलीशरण गुप्त
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Paper Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 1969 |
| Edition Year | 1978, Ed. 2nd |
| Pages | 144p |
| Price | ₹50.00 |
| Publisher | Lokbharti Prakashan - Hans Prakashan |
| Dimensions | 17 X 12 X 0.5 |