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Sirhane Gramshi

Author: Arun Maheshwari
Edition: 2014, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Sirhane Gramshi

फासिस्टों के नर-मेघी यातना और मृत्यु शिविरों से लेकर साइबेरिया के निर्वासन शिविरों और अमेरिकी जेल-औद्योगिक गठजोड़ वाले क़ैदखानों तक की कमोबेश एक ही कहानी है। नागरिक स्वतंत्रता की प्रमुख अमेरिकी कार्यकर्ता एंजिला डेविस की शब्दावली में—आज भी जारी दास प्रथा की कहानी। सुधारगृह कहे जानेवाले भारतीय जेल इनसे शायद ही अलग हैं। इटली में फासिस्टों के जेल में बीस साल के लिए सज़ायाफ़्ता मार्क्सवादी विचारक और कम्युनिस्ट नेता अन्तोनिओ ग्राम्शी ने सज़ा के दस साल भी पूरे नहीं किए कि उनके शरीर ने जवाब दे दिया। मृत्यु के एक महीना पहले उन्हें रिहा किया गया था। लेकिन जेल में बिताए इन चंद सालों के आरोपित एकान्त का उन्होंने इटली के इतिहास, उसकी संस्कृति, मार्क्सवादी दर्शन तथा कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में गहरे विवेचन के लिए जैसा इस्तेमाल किया, उसने उनकी जेल डायरी को दुनिया के श्रेष्ठतम जेल-लेखन के समकक्ष रख दिया। ख़ास तौर पर कम्युनिस्ट पार्टियों में शामिल लोगों के लिए तो इसने जैसे सोच-विचार के एक पूरे नए क्षेत्र को खोल दिया। ग्राम्शी का यह पूरा लेखन कम्युनिस्टों को, किसी भी मार्क्सवादी के लिए अपेक्षित, तमाम वैचारिक जड़ताओं से मानसिक तौर पर उन्मुक्त करने का एक चुनौती भरा लेखन है। एक ऐसे विचारक के साथ जेल में बिताए चंद दिनों की यह डायरी किसी भी पाठक के लिए, ख़ास तौर पर राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए बहुत उपयोगी अनुभव साबित हो सकती है। इसकी पारदर्शी भाषा, अन्त:स्थित सूक्ष्म वेदना और स्वच्छन्द विचार-प्रवाह ने इस पुस्तक को अपने प्रकार की एक अनूठी कृति का रूप दिया है। 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2014
Edition Year 2014, Ed. 1st
Pages 168p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 1.5
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Arun Maheshwari

Author: Arun Maheshwari

अरुण माहेश्वरी

मार्क्सवादी आलोचक, सामाजिक-आर्थिक विषयों के टिप्पणीकार एवं पत्रकार।

जन्म : 4 जून, 1951; विज्ञान में स्नातक के बाद दो वर्षों तक कोलकाता विश्वविद्यालय की सीढ़ियों पर क़ानून की पढ़ाई के लिए टहलक़दमी। छात्र जीवन से ही मार्क्सवादी राजनीति और साहित्य-आन्दोलन से जुड़ाव और सी.पी.आई.(एम.) के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ से सम्बद्ध। साहित्यिक पत्रिका ‘क़लम’ का सम्पादन। जनवादी लेखक संघ के केन्द्रीय सचिव एवं पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव।

प्रमुख कृतियाँ : ‘साहित्य में यथार्थ : सिद्धान्त और व्यवहार’, ‘आर.एस.एस. और उसकी विचारधारा’, ‘नई आर्थिक नीति : कितनी नई’, ‘कला और साहित्य के सौन्दर्यशास्त्रीय मानदंड’, ‘जगन्नाथ’ (अनूदित नाटक); ‘जनतंत्र और समाजवाद की समस्याएँ’, ‘मानव विकास के दस विषय’, ‘एक और ब्रह्मांड’, ‘पाब्लो नेरुदा : एक क़ैदी की खुली दुनिया’, ‘पश्चिम बंगाल में मौन क्रान्ति’, ‘सिरहाने ग्राम्शी’, ‘हरीश भादानी’, ‘धर्म, संस्कृति और राजनीति’, ‘समाजवाद की समस्याएँ’ आदि।

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