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Singhbhum Ka Itihas: Pracheen Se Purv-Aupniveshik Kaal Tak-Hard Cover

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9789360862473
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औपनिवेशक पराधीनता झेल चुके समाजों का इतिहास जाने-अनजाने औपनिवेशक दृष्टिकोण के बोझ से दबा नजर आता है। भारत के आदिवासियों के सन्दर्भ में यह समस्या दोहरी रही है क्योंकि उनके सामने ब्रिटिश पराधीनता के साथ-साथ वर्चस्वशाली गैर-आदिवासी तबके का शोषण भी रहा है। दरअसल आदिवासियों का इतिहास भी अब तक ज्यादातर गैर-आदिवासी ही लिखते रहे हैं जिसमें उन्हें देखने के दो प्रमुख दृष्टिकोण रहे हैं। पहला, सब-आल्टर्न परिप्रेक्ष्य जिसमें इतिहास को नीचे से देखने अर्थात उपेक्षित-वंचित तबकों का इतिहास में समुचित उल्लेख करने और उन्हें वाजिब श्रेय देने पर जोर रहा है। और दूसरा, राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य जिसमें मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में आदिवासियों की भूमिका को रेखांकित किया जाता रहा है। ये दोनों दृष्टिकोण भी आदिवासी समुदायों को अन्य और विशिष्ट सांस्कृतिक समूह मानने की औपनिवेशिक भ्रान्ति से मुक्त नहीं रह पाए। इसलिए इन दोनों तरह के इतिहासकारों के लेखन में प्राचीन और मध्यकालीन आदिवासी राजवंशों और गणराज्यों की प्रभावी उपस्थिति का जिक्र या आकलन न के बराबर मिलता है। ललिता सुंडी की यह पुस्तक उपरोक्त सीमाओं को लाँघकर आदिवासी इतिहास को  बहुआयामी स्वरूप प्रदान करती है। इसमें सिंहभूम की भौगोलिक स्थिति, प्राचीन इतिहास, राजवंशों का उदय, राजनीतिक परिदृश्य, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराएँ, पारम्परिक शासनप्रणाली, क्षेत्र के प्रमुख आदिवासी समुदायों का महत्व और उनका परस्पर सम्बन्ध आदि तमाम विषयों को समाहित किया गया है। इस ऐतिहासिक विवेचना में सिंहभूम के अर्थशास्त्रीय पक्ष को भी शामिल किया गया है। वस्तुतः यह पुस्तक सिंहभूम के हवाले से आदिवासियों के प्रति रूढ़ दृष्टिकोण को नकारने की एक शोधपरक पहल है जिसमें उन्हें सिर्फ जंगल और पिछड़ेपन से जोड़कर देखे जाने के विपरीत उनके समृद्ध इतिहास को प्रस्तुत किया गया है। इसका दस्तावेजी महत्त्व असंदिग्ध है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Ranendra
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 264p
Price ₹795.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2
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You're reviewing:Singhbhum Ka Itihas: Pracheen Se Purv-Aupniveshik Kaal Tak-Hard Cover
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Lalita Sundi

Author: Lalita Sundi

ललिता सुंडी

झारखंड के समकालीन इतिहासकारों में अग्रणी ललिता सुंडी का जन्म 3 जून, 1974 को हुआ। वे पश्चिमी सिंहभूम जिले के हो आदिवासी समाज से आती हैं। उन्होंने दसवीं तक की शिक्षा सन्त जेवियर बालिका उच्च विद्यालय, चाईबासा से, जबकि इंटरमीडिएट से स्नातकोत्तर तक की शिक्षा उत्कल विश्वविद्यालय, ओड़िशा से हासिल की। उन्होंने 2000 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा पास की और 2013 में राँची विश्वविद्यालय, राँची के इतिहास विभाग से ‘सिंहभूम की मानकी-मुंडा व्यवस्था : एक ऐतिहासिक अध्ययन’ विषय पर पी-एच. डी. की उपाधि हासिल की। अध्ययन पूरा करने के बाद उन्होंने अपने गृह जिले पश्चिमी सिंहभूम को अपना कार्यक्षेत्र बनाया तथा खुद को आदिवासियों के इतिहास सम्बन्धी शोध-अध्ययन और लेखन पर एकाग्र किया। उनके दर्जनों लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं, जबकि कई लेख पुस्तकों में भी शामिल किए गए हैं। वर्तमान में वे कोल्हान विश्वविद्यालय के महिला कॉलेज, चाईबासा में इतिहास विभाग की प्रमुख के पद पर कार्यरत हैं। वे झारखंड सरकार के अधीन डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, मोरहाबादी, राँची की दो अनुसन्धान परियोजनाओं से भी जुड़ी हुई हैं।

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