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Sidha-Sada Rasta-Hard Cover

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9788171198115
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‘सीधा-सादा रास्ता’ भगवतीचरण वर्मा के चर्चित उपन्यास ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ की उत्तर-कथा है। इस उपन्यास के पात्र, परिस्थितियाँ, सामाजिक व्यवहार, घर, सम्पत्ति और भूगोल सब वही हैं जो ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ के हैं लेकिन ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ की कहानी ‘सीधा-सादा रास्ता’ के पात्रों का मात्र अतीत है। इस तरह ‘सीधा-सादा रास्ता’ ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ के आगे की कहानी है।

रांगेय राघव को भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास में वर्णित पात्रों, परिस्थितियों और विचारों में कुछ विकृतियाँ नज़र आईं, इसलिए उन्होंने उन्हीं पात्रों और परिस्थितियों के आधार पर इस उपन्यास की रचना की। हिन्दी साहित्य के दो दिग्गजों के वैचारिक संघर्ष का प्रतिफलन यह उपन्यास पढ़ना अपने आपमें एक दिलचस्प अनुभव से गुज़रने जैसा है।

प्रस्तुत उपन्यास के लेखक रांगेय राघव के ही शब्दों में, “जैसा जो वर्मा जी का पात्र है, उसको मैंने वैसा ही लिया है, पर वर्मा जी ने चित्र का एक पहलू दिखाया है, मैंने दूसरा भी।”

यह उपन्यास इस तथ्य की पुष्टि करता है कि ‘देश और काल के बिना कुछ भी सीधा...सादा...रास्ता नहीं है।’

अपनी रौ में बहा ले जानेवाली भाषा, अनूठे शिल्प और ज़बर्दस्त अन्तर्वस्तु के कारण यह उपन्यास पाठकों के रचनात्मक सोच को नया आयाम प्रदान करेगा, ऐसी आशा है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1967
Edition Year 2026, Ed. 5th
Pages 388p
Price ₹995.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2
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Rangeya Raghav

Author: Rangeya Raghav

रांगेय राघव

रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी, 1923 को आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका मूल नाम टी.एन.वी. आचार्य—तिरुमल्लै नंबकम् वीरराघव आचार्य था। उन्होंने सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा से 1944 में स्नातकोत्तर और 1949 में आगरा विश्वविद्यालय से ‘गुरु गोरखनाथ और उनका युग’ विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। हिन्दी, अंग्रेजी, ब्रज और संस्कृत पर उनका असाधारण अधिकार था। 13 वर्ष की छोटी आयु में ही लिखना शुरू किया। 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद ‘तूफानों के बीच’ नाम से एक बहुचर्चित रिपोर्ताज लिखा। उन्हें चालीस साल से भी कम उम्र मिली इसके बावजूद कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज के अतिरिक्त आलोचना, संस्कृति और सभ्यता पर जमकर काम किया और कुल मिलाकर 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उन्होंने भारतेन्दु, कबीर, तुलसी, कृष्ण, बुद्ध, विद्यापति, गोरखनाथ और बिहारी जैसे रचनाकारों और व्यक्तित्वों को केन्द्र में रखकर कई रचनाएँ लिखीं। ‘मुर्दों का टीला’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘सीधा-सादा रास्ता’, ‘लोई का ताना’, ‘साम्राज्य का वैभव’ तथा ‘प्रगतिशील साहित्य के मापदंड’ उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। अंग्रेजी और संस्कृत से बड़ी संख्या में अनुवाद भी किया। उन्हें ‘हिन्दुस्तानी अकादमी पुस्कार’, ‘डालमिया पुरस्कार’, ‘उत्तर प्रदेश शासन पुरस्कार’ और मरणोपरान्त ‘महात्मा गांधी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। 12 सितम्बर, 1962 को बम्बई में उनका निधन हुआ। 

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