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Sanskriti : Rajya, Kalayen Aur Unse Pare-Hard Cover

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9788171787609
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संस्कृति भारतीय अनुभव की आत्मा है। भारतीय अनुभव को समझने के लिए आवश्यक है कि उसके मर्म में स्थित भारतीय संस्कृति को समझा जाए। ईसाई युग के अभ्युदय से काफ़ी पहले ही पूर्णत: विकसित हो चुकी इस संस्कृति ने भारतवासियों को (और समस्त भरतवंशियों को भी) एक निश्चित अस्मिता और चरित्र से सम्पन्न किया है। लेखक की मान्यता है कि संस्कृति के इसी अवदान के कारण भारतीय जन-गण इतिहास के कई दौरों और मानव-चेतना में हुए कई परिवर्तनों के बावजूद अपनी अखंडता सुरक्षित रख पाए हैं।

यह पुस्तक भारतीय संस्कृति की एक असाधारण अन्वेषण-यात्रा करते हुए व्याख्यात्मक प्रयास के ज़रिए कई अन्तर्सम्बन्धित विषय-वस्तुओं पर प्रकाश डालती है। इन्हीं में से एक धारणा यह है कि भारत में एक विकसित संस्कृति और विकासमान अर्थव्यवस्था का दुर्लभ संयोग मिलता है। लेखक का दावा है कि बीसवीं सदी के आख़िरी वर्षों में राष्ट्र-समुदाय के बीच राष्ट्रों की हैसियत तय करने में संस्कृति का कारक महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। शीतयुद्धोत्तर विश्व में ‘बाज़ार’ ने ‘सैन्य-शक्ति’ को प्रतिस्थापित कर दिया है और ‘संस्कृति’ अब इन दोनों के महत्त्व को चुनौती दे रही है। लेखक ने कला और संस्कृति के साथ भारतीय राज्य की अन्योन्यक्रिया की जाँच-पड़ताल ऐतिहासिक ही नहीं, समकालीन दृष्टिकोण से भी की है। उनकी मान्यता है कि जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आज़ाद के ज़माने से ही भारत सरकार कला और संस्कृति के क्षेत्रों को प्रायोजित करने और संरक्षण देने की नीति के साथ प्रतिबद्ध रही है (इस विषय से जुड़े हुए कुछ पत्राचार सम्बन्धी अप्रकाशित दस्तावेज़ भी पुस्तक में उद्धृत किए गए हैं)।

नब्बे के दशक की शुरुआत से जारी अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और पश्चिमी मीडिया के प्रभावों के मद्देनज़र लेखक ने व्यापारिक क्षेत्र द्वारा संस्कृति के क्षेत्र में सरकार के साथ जुड़ने की आवश्यकता की ओर ध्यान खींचा है। उसका तर्क है कि धरोहर स्थलों के समुचित संरक्षण और भारतीय संस्कृति के रचनात्मक रखरखाव के लिए परियोजनाओं और कार्यक्रमों के प्रायोजित करने का दायित्व निभाने में निजी क्षेत्र सरकार की मदद कर सकता है। पुस्तक इस सम्बन्ध में विचारवान नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका को उभारते हुए सुझाव देती है कि देश की सांस्कृतिक धरोहर के प्रबन्धन के लिए भारत सरकार को इस काम में विशेष रूप से पारंगत प्रशासनिक कैडर का गठन करना चाहिए। संस्कृति से सम्बन्धित यह सर्वथा नवीन विश्लेषण ‘सभ्यताओं में संघर्ष’ जैसी बहुप्रचारित धारणाओं को अस्वीकार करते हुए सभ्यताओं के बीच मैत्री का परिदृश्य व्याख्यायित करता है और उसे लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण के व्यापकतर सन्दर्भ से जोड़ देता है। लेखक की दलील है कि इस वैचारिक विन्यास के लिए आनेवाली सहस्राब्दि में गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी की शिक्षाएँ उत्तरोत्तर प्रासंगिक होती चली जाएँगी।

भारतीय सांस्कृतिक इतिहास, राजकीय नीति के विश्लेषण और दार्शनिक विचार-विमर्श के मिश्रण के माध्यम से यह पुस्तक राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर और उसके भारतीय व वैश्विक सन्दर्भों पर एक चुनौतीपूर्ण व नवीन दृष्टि डालती है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Isbn 10 8171787606
Publication Year 1999
Edition Year 1999, Ed. 1st
Pages 206p
Price ₹325.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 1.5
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Balmeeki Prasad Singh

Author: Balmeeki Prasad Singh

बाल्मीकि प्रसाद सिंह

जन्म : 1 जनवरी, 1942

सिक्किम के राज्यपाल रहे बाल्मीकि प्रसाद सिंह एक मान्य विद्वान, विचारक और प्रशासक हैं। आपको ‘जवाहरलाल फ़ेलोशिप’ (1982-84), ‘क्वीन एलिज़ाबेथ फ़ेलोशिप’ (1989-90) और ‘महात्मा गांधी फ़ेलोशिप’ सहित अनेक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें विशिष्ट प्रशासनिक सेवा के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा ‘गुलजारी लाल नंदा अवार्ड’ (1998) और माननीय दलाई लामा द्वारा ‘मैन ऑफ़ लैटर्स अवार्ड’ (2008) भी शामिल हैं।

विगत दशकों में आप अतिरिक्त सचिव (पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 1993-95), संस्कृति सचिव (1995-97) और गृह सचिव (1997-99) जैसे विभिन्न महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। 1999-2002 की अवधि में आप विश्वबैंक में कार्यकारी निदेशक और राजदूत भी रहे।

आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं : ‘द प्रॉब्लम ऑफ़ चेंज : ए स्टडी ऑफ़ नॉर्थ ईस्ट इंडिया’, ‘इंडिया’ज़ कल्चर : द स्टेट, द आट् र्स एंड बियॉन्‍ड’ (जो हिन्‍दी में ‘संस्कृति : राज्य, कलाएँ और उनसे परे’ शीर्षक से प्रकाशित), ‘बहुधा एंड द पोस्‍ट 9/11 वर्ल्‍ड विथ ए फ़ॉरवर्ल्‍ड बाइ हिज होलीनेस द दलाई लामा’, ‘द इंडियन नेशनल कांग्रेस एंड कल्‍चरल रिनेसन्‍स’, ‘थ्रेड
वोवन : आयडियल्‍स, प्रिंसिपल्‍स एंड एडमिनिस्‍ट्रेशन’, ‘आवर इंडिया’। इनके अलावा ‘द मिलेनियम बुक ऑन न्यू दिल्ली’ (2001) का सम्पादन किया है।

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