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Samkaleen Sabhyata Ke Sankat Ki Mahagatha_Nirvasan-Hard Cover

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9788119996087
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किसी कृति का महत्त्व इससे तय होता है कि उसे विभिन्न दृष्टिकोणों से परखा जा सकता है या नहीं। इस सन्दर्भ में यह देखना भी आवश्यक है कि उसकी वि​विध व्याख्याएँ हो सकती हैं, और हर व्याख्या-विश्लेषण से आगे उसे और नये आयामों/सन्दर्भों में परखने की राह निकलती है या नहीं। इस पुस्तक के लेखों में अखिलेश के ख्यात उपन्यास ‘निर्वासन’ को इन्हीं आधारों पर देखा-परखा गया है। उपन्यास में वर्णित वस्तुस्थितियों, प्रतिरोध के विभिन्न पहलुओं तथा जीवन के धूसर रंग के साथ चटख रंग जैसे विभिन्न आयामों को लेखकों ने विवेचित-विश्लेषित किया है। ‘समकालीन सभ्यता के संकट की महागाथा : निर्वासन’ में संकलित लेखों में उपन्यास के कथ्य में निहित दुश्चिन्ताओं से लेकर इसके सौन्दर्य पक्ष तक पर विचार किया गया है। यहाँ उचित ही यह रेखांकित किया गया है कि ‘निर्वासन’ में वर्णित संकट सिर्फ इसके पात्रों का संकट नहीं है बल्कि यह वर्तमान मनुष्य का संकट है। इस तरह यह पुस्तक उपन्यास के व्यापक परिप्रेक्ष्य को सप्रमाण प्रस्तुत करती है। मनुष्यता के ऊपर आए संकटों की शिनाख़्त करने के क्रम में लेखकगण जीवन के उन सुन्दर क्षणों को रेखांकित करना नहीं भूले हैं जिनसे तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी मनुष्य की उम्मीद खत्म नहीं होती।

उम्मीद है कि ‘समकालीन सभ्यता के संकट की महागाथा : निर्वासन’ पाठकों के समक्ष ‘निर्वासन’ में अन्तर्निहित आयामों के विविध पक्षों को उद्घाटित कर उसकी श्रेष्ठता का साक्षात्कार कराने में सहायक होगी।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 280p
Price ₹895.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2.5
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Author: Rajeev kumar

राजीव कुमार

राजीव कुमार का जन्म 15 मई,1976 को ग्राम–माँची, जिला–सीतामढ़ी, बिहार में हुआ। उन्होंने कुछ दिनों तक दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में अध्यापन किया तथा कुछ समय के लिए मानविकी विद्यापीठ, इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में परामर्शदाता, हिन्दी भी रहे। उनका एक कहानी-संग्रह ‘तेज़ाब’ प्रकाशित है जिसके लिए उन्हें वर्ष 2010 का ‘ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार’ प्रदान किया गया। ‘स्वयं प्रकाश : चुनी हुई कहानियाँ’ और ‘10 प्रतिनिधि कहानियाँ : असगर वज़ाहत’ का उन्होंने सम्पादन किया है। वे ‘बनास जन’ पत्रिका के अखिलेश और रवीन्द्र कालिया पर केन्द्रित विशेषांकों के अतिथि सम्पादक रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइटों पर उनकी समीक्षाएँ, लेख प्रकाशित होते रहते हैं। कथालोचना में उनकी विशेष रुचि है।

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