Rangmanch Ka Jantantra

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Rangmanch Ka Jantantra
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रंगमंच का जनतंत्र ऐसी रचनाओं का संकलन है, जो रंगमंच की जनतांत्रिकता को गहराई से रेखांकित करती हैं। यह अतीत और वर्तमान की यायावरी है। इस यात्रा में समय, समाज, जीवन और रंगमंच के कई पहलू उद्घाटित होते हैं। इन रचनाओं का भूगोल काफ़ी विस्तृत है। यहाँ संस्कृत रंगमंच की महान परम्परा से लेकर आज के रंगमंच तक की अर्थवान छवियाँ अंकित हैं। इनमें एक ओर विदूषक और सूत्रधार जैसे रूढ़ चरित्रों तथा पूर्वरंग जैसी रंगरूढ़ियों का विश्लेषण है, तो दूसरी ओर भाषा संगीतकों के उदय, पारसी रंगमंच के अवसान, आज़ादी के बाद की रंगचेतना आदि की विवेचनात्मक पड़ताल है। समय के अन्तरंग में उतरकर अपनी रंगसम्पदा को जानने-समझने की ज़िद करती ये रचनाएँ पाठकों से आत्मीय संवाद क़ायम करती हैं। शास्त्रीयता, पारम्परिकता, महाकाव्यात्मकता, कालविद्धता और जनपक्षधरता की खोज में हृषीकेश सुलभ कई अजाने रास्तों से भी गुज़रते हैं और नए अन्तर्विरोधों की तरफ़ संकेत करते हैं।

समय और समाज को अभिव्यक्त करने के लिए नई रंगभाषा, रंगदृष्टि, रंगयुक्तियों आदि की खोज करते हुए वह समकालीन रंगमंच की समस्याओं-चिन्ताओं से टकराते हैं और हमारे समय का रंगविमर्श रचते हैं। अपनी बात कहने के लिए हृषीकेश सुलभ ने रंगसिद्धान्तों, रंगव्यक्तित्वों, पुस्तकों, शैलियों, रंगप्रदर्शनों आदि विविध माध्यमों का सहारा लिया है। यह विविधता ही सही अर्थों में ‘रंगमंच का जनतंत्र’ की विशिष्टता है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2009
Edition Year 2022, Ed. 2nd
Pages 248p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2
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Editorial Review

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Hrishikesh Sulabh

Author: Hrishikesh Sulabh

हृषीकेश सुलभ

कथाकार, नाटककार, रंग-समीक्षक हृषीकेश सुलभ का जन्म 15 फरवरी, 1955 को बिहार के छपरा (अब सीवान) जनपद के लहेजी नामक गाँव में हुआ। आरम्भिक शिक्षा गाँव में हुई और अपने गाँव के रंगमंच से ही आपने रंग-संस्कार ग्रहण किया। आपकी कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित और अंग्रेज़ी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।

आप रंगमंच से गहरे जुड़ाव के कारण कथा-लेखन के साथ-साथ नाट्य-लेखन की ओर उन्मुख हुए और भिखारी ठाकुर की प्रसिद्ध नाट्यशैली बिदेसिया की रंगयुक्तियों का आधुनिक हिन्दी रंगमंच के लिए पहली बार अपने नाट्यालेखों में सृजनात्मक प्रयोग किया। विगत कुछ वर्षों से आप कथादेश मासिक में रंगमंच पर नियमित लेखन कर रहे हैं।

आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं : ‘अग्न‍िलीक’ (उपन्यास); ‘तूती की आवाज़’ (‘पथरकट’, ‘वधस्थल से छलाँग’ और ‘बँधा है काल’ एक जिल्द में शामिल); ‘वसंत के हत्यारे’, ‘हलन्त’ (कहानी-संग्रह); ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (चयन); ‘अमली’, ‘बटोही’, ‘धरती आबा’ (नाटक); ‘माटीगाड़ी’ (शूद्रक रचित ‘मृच्छकटिकम्’ की पुनर्रचना), ‘मैला आँचल’ (फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास का नाट्यान्तर), ‘दालिया’ (रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित नाटक); ‘रंगमंच का जनतंत्र’ और ‘रंग-अरंग’ (नाट्य-चिन्तन)।

सम्पर्क : पीरमुहानी, मुस्लिम क़ब्रिस्तान के पास, कदमकुआँ, पटना–800 003

ई-मेल : hrishikesh.sulabh@gmail.com

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