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Ramvilas Sharma Ke Patra

Edition: 2021, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Ramvilas Sharma Ke Patra

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लेखकों और कलाकारों के पत्रों में एक विशेष क़िस्म की ऊष्मा होती है। कारण कि वे अपने समय को न सिर्फ़ गहराई से देखते हैं, बल्कि उस पर एक विशेष नज़रिये से विचार भी करते हैं। इस पुस्तक में रामविलास शर्मा द्वारा लिखे गए पत्रों को खोजकर संकलित किया गया है।
रामविलास जी हिन्दी आलोचना के बड़े स्तम्‍भ रहे हैं, और आज भी हैं। उन्होंने भाषा तथा साहित्य पर विपुल लेखन किया। इन पत्रों में हमें उनका एक अलग और बहुत आत्मीय रूप दिखाई देता है। उनके पत्रों को लेकर कुछ पुस्तकें पहले भी प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन उनमें उनके लिखे पत्र कम ही हैं। उन्हें लिखे गए पत्रों की संख्या ज़्यादा है। उनके लिखे पत्रों को एक ज़िल्द में उपलब्ध कराने की मंशा ही इस पुस्तक की वजह बनी।
इन पत्रों को प्राप्त करने के लिए सम्बन्धित लोगों से पत्र-व्यवहार से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं में विज्ञापन तक दिए गए। इसके अलावा भी हर सम्भावित व्यक्ति से सम्पर्क किया गया, तब जाकर यह सामग्री एकत्र हो पाई।
इन पत्रों में रामविलास जी की सहज संवेदना तो दिखाई देती ही है, पत्र पाने वालों की दैनन्दिन समस्याओं के प्रति गम्भीर सहानुभूति भी दृष्टिगोचर होती है। रामविलास जी की साहित्येतर रुचियों की जानकारी भी हमें इनसे मिलती है। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह एक दस्तावेज़ी और संग्रहणीय पुस्तक है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2021
Edition Year 2021, Ed. 1st
Pages 574p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 4
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Author: Vijay Mohan Sharma

डॉ. विजय मोहन शर्मा

डॉ. विजय मोहन शर्मा का जन्म 10 अक्टूबर, 1938 को हुआ। उन्होंने आई.आई.टी., दिल्ली से एम.ई. और पी-एच.डी. की।

केन्द्रीय मृदा एवं सामग्री अनुसन्धानशाला के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए; इंडियन नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग के ‘फेलो’ रहे। तकनीकी विषयों पर लगभग 250 पर्चे प्रकाशित; दस पुस्तकों का सम्पादन/सह-सम्पादन; कई राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के सलाहकार सम्पादन मंडल में रहे। उनका निधन 5 जुलाई, 2021 को हुआ।

रामविलास शर्मा से सम्बन्धित पुस्तकों—अत्रकुशलं तत्रास्तु, समालोचक, (चार खंड); संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्याएँ, भाषा साहित्य और जातीयता, सचेतक और डॉ. रामविलास शर्मा (तीन खंड) का सम्पादन।

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