Pratinidhi Kavitayen : Vishnu Khare

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Pratinidhi Kavitayen : Vishnu Khare
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विष्णु खरे एक विलक्षण कवि हैं—लगभग लासानी। एक ऐसा कवि जो गद्य को कविता की ऊँचाई तक ले जाता है और हम पाते हैं कि अरे, यह तो कविता है! ऐसा वे जान-बूझकर करते हैं—कुछ इस तरह कि कविता बनती जाती है—कि गद्य छूटता जाता है। पर शायद वह छूटता नहीं—कविता में समा जाता है। ...वे लम्बी कविताओं के कवि हैं—जैसे मुक्तिबोध लम्बी कविताओं के कवि हैं। पर दोनों में अन्तर है। मुक्तिबोध की लम्बाई लय के आधार को छोड़ती नहीं—धीरे-धीरे वह कम ज़रूर होता गया है। विष्णु खरे गद्य की पूरी ताक़त को लिए-दिए चलते हैं—उसे तोड़ते-बिखेरते हुए, बीच-बीच में संवाद का सहारा लेते और जहाँ-तहाँ उसे डालते हुए चलते हैं और लय को न आने देते हुए।

किसी चीज़ को शब्दों में ज़िन्दा कर देना एक कवि की सिफ़त है और विष्णु खरे के पास वह जादू है।

—केदारनाथ सिंह

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Language Hindi
Format Paper Back
Publication Year 2017
Edition Year 2021, Ed 2nd
Pages 128p
Translator Not Selected
Editor Kedarnath Singh
Publisher Rajkamal Prakashan
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Vishnu Khare

Author: Vishnu Khare

विष्णु खरे

जन्म : 9 फ़रवरी, 1940; छिन्दवाड़ा (म.प्र.)।

विष्णु खरे की प्रारम्भिक रचनाएँ ग.मा. मुक्तिबोध द्वारा नागपुर के साप्ताहिक ‘सारथी’ (1956-57) में प्रकाशित। फिर वह ‘वसुधा’, ‘कृति’, ‘कहानी’, ‘नई कविता’, ‘धर्मयुग’ आदि में प्रकाशित हुए। ‘आलोचना’ में 1969-70 में छपी कविता ‘टेबिल’ के बाद से उनकी अपनी कविता और शेष हिन्दी पद्य में कुँवर-केदार-रघुवीर त्रयी के बाद अब तक एक दूरगामी मौलिक परिवर्तन माना जाता है। 1960 में टी.एस. एलिअट की कविताओं का अनुवाद ‘मरु-प्रदेश और अन्य कविताएँ’। क्रिस्टियन कॉलेज इन्दौर में पढ़ते हुए (1961-63) दैनिक ‘इन्दौर समाचार’ तथा फ़िल्म-साप्ताहिक ‘सिनेमा एक्सप्रेस’ में पत्रकारिता। अंग्रेज़ी में मेरिट में एम.ए. के बाद 1963-75 के बीच मध्य प्रदेश और दिल्ली में स्नातकोत्तर और ऑनर्स कक्षाएँ पढ़ाईं। अशोक वाजपेयी द्वारा ‘पहचान’ सीरीज़ (1970) की शुरुआत ‘विष्णु खरे की बीस कविताएँ’ से। 1978 में पहला संग्रह ‘ख़ुद अपनी आँख से’ आया जिसे रघुवीर सहाय ने ‘अद्वितीय’ कहा। 1975-84 के बीच केन्द्रीय साहित्य अकादेमी में प्रकाशन, अकादेमी पुरस्कार तथा साहित्यिक गतिविधियों के प्रभारी उप-सचिव, फिर 1994 तक तत्कालीन शीर्षस्थ दैनिक ‘नवभारत टाइम्स’ के लखनऊ-जयपुर संस्करणों के सम्पादक तथा मुख्य दिल्ली-संस्करण के विचार प्रमुख-सम्पादक। सैकड़ों सम्पादकीय और लेख। अंग्रेज़ी में भी प्रचुर लेखन। अकादेमी तथा ‘नवभारत टाइम्स’ विचारधारागत मतभेदों के कारण छोड़े—तब से ‘स्वतंत्र लेखन।’ चालीस से भी अधिक प्रकाशन जिनमें संकलन ‘पिछला बाक़ी’, ‘सबकी आवाज़ के पर्दे में’, ‘काल और अवधि के दरमियान’, ‘लालटेन जलाना’, ‘कवि ने कहा’, ‘पाठान्तर’, ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ और ‘और अन्य कविताएँ’ शामिल हैं। आलोचना, पत्रकारिता, सिने-लेखन, तथा अंग्रे़ज़ी, जर्मन, मराठी में मुकम्मल अनुवाद, देशी-विदेशी भाषाओं से कविता, गल्प तथा गद्य के अनुवाद, राजेन्द्र माथुर संचयन-सम्पादन। पाब्लो नेरुदा, शमशेर बहादुर सिंह, सुदीप बनर्जी पर सम्पादित विशेषांक, विश्व-कवि गोएठे का कालजयी काव्य-नाटक ‘फ़ाउस्ट’, ‘फ़िनी’, महाकाव्य ‘कलेवाला’, एस्टोनियाई महाकाव्य ‘कलेवीपोएग’, डच उपन्यासकार-द्वय  सेस नोटेबोम तथ हरी मूलिश की कृतियाँ अनूदित। निजी रचनाओं के अनुवाद कई राष्ट्रीय और विदेशी भाषाओं में। शीर्ष फ़िल्म-समीक्षक की हैसियत से कान, ला रोशेल तथा रोत्तर्दम के प्रतिष्ठित सिने-समारोहों में आमंत्रित। चालीस से अधिक साहित्यिक-शैक्षणिक विदेश-यात्राएँ। 1986 में पत्रकर की हैसियत से प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शिष्टमंडल में राष्ट्र-संघ, अमेरिका की यात्रा। फ़िनलैंड, एस्तोनिया, हंगरी तथा पोलैंड के राष्ट्रीय सम्मानों सहित अनेक स्वदेशी-विदेशी पुरस्कार। हिन्दी अकादमी, दिल्ली के उपाध्यक्ष भी रहे।

निधन : 19 सितम्बर, 2018

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