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Peechhe Firat Kahat Kabir-Kabir-Paper Back

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तुलसी के राम में अनीस के हुसैन की झलक देखनी हो, कबीर में क़ुरान की आयतों का असर समझना हो, अनीस के मर्सियों में संस्कृत शेरियात की तलाश हो, तुलसी और जायसी का मुवाज़ना करना हो, हसरत मोहानी के कन्हैया को भगतों की राधा में खोजना हो, फ़िराक़ गोरखपुरी में ब्रज और अवधी कविता के रूपकों और रसों को चिन्हित करना हो, अमीर ख़ुसरो और बारहमासा को एक दूसरे के तनाज़ुर में पहचानना हो, ज़ाकिर हुसैन और मोहम्मद मुजीब के ज़रिए जामिया के तालीमी कारनामों को उजागर करना हो, या भक्ति और सूफ़ी परम्पराओं पर अज़–सरे नौ रौशनी डालनी हो, इस किताब में मुजीब रिज़वी उर्दू-हिंदी साहित्य को नए पैमानों और नए कीर्तिमानों से स्थापित और विश्लेषित करते नज़र आते हैं। एक साथ हिंदी और उर्दू के आधुनिक और मध्ययुगीन विचारों, संस्कृत और फ़ारसी सिद्धांतों, सूफ़ी और भक्ति भावनाओं को सम्मिश्रित करने वाले वे शायद आख़िरी ऐसे विद्वान थे। इसीलिए वे जायसी में रूमी को और कबीर में क़ुरान और हाफ़िज़ को खोज निकालते हैं। तुलसी में फ़ारसी सूफ़ी अल्फ़ाज़ को ढूँढ़ते हैं और हिंदी/उर्दू की संरचना में फ़ारसियत की भूमिका को इंगित कर सकते हैं। हिंदुस्तान पर मुसलमानों के असर और मुसलमानों पर हिंदुस्तान जन्नतनिशान के प्रभावों को शायद इसके पहले इतने बृहद परिप्रेक्ष्य और परिदृश्य में नहीं देखा समझा गया। यह किताब भारतीय साहित्य और हिंद-इस्लामी संस्कृति को एक नए तर्ज़ और नए अंदाज़ से हमारे सामने रखते हुए हिंदुस्तानियत की एक नई और विलक्षण परिभाषा से हमें रूबरू कराती है।

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Mohammad Yusuf
Editor Not Selected
Publication Year 2022
Edition Year 2022, Ed. 2st
Pages 224p
Price ₹399.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1
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Mujeeb Rizvi

Author: Mujeeb Rizvi

मुजीब रिज़वी

मुजीब रिज़वी इलाहाबाद की मशहूर तहसील चयल के एक क़स्बे में 14 मई, 1934 को पैदा हुए। आरंभिक शिक्षा इलाहाबाद में हुई। स्नातक की डिग्री इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से हासिल की। इस दौरान वो पंडित सुंदरलाल के सानिध्य में स्वतंत्रता आंदोलन और वामपंथी आंदोलनों एवं गतिविधियों में भी सक्रिय रहे। अलीगढ़ से हिंदी में एम.ए. करने के बाद उन्होंने 1960 की दहाई में जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हिंदी विभाग की नींव डाली। उन्होंने जामिया और हिन्दी विभाग की बेशक़ीमत खिदमत की और अंततः एक्टिंग वाइस चांसलर होकर वहीं से सेवानिवृत्त हुए। सूफ़ी प्रेमाख्यानों पर उनके अनेक निबंध हैं और वे इस विषय के अद्भुत विशेषज्ञ थे। ‘सब लिखनी कै लिखु संसारा : पद्मावत और जायसी की दुनिया’ उनकी बहुचर्चित किताब है। जायसी, मीर अनीस, फ़िराक़, वैष्णव भक्ति, तुलसी, मुल्ला दाऊद, कबीर और दूसरे सूफ़ी-भक्ति विचारधारा के निर्गुण-सगुण कवियों पर उनके निबन्धों पर आधारित यह किताब ‘पीछे फिरत कहत कबीर कबीर’ 2009 में उर्दू में प्रकाशित हुई थी और अब पहली बार हिंदी में आ रही है। 24 मई, 2015 को उनका निधन हुआ।

 

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