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Nirmohi Bhanvara-Paper Back

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सुबह के पक्षी का प्रभात-वन्दना सुनकर तो हम उसकी प्रशंसा करते हैं, किन्तु पक्षी का धर्म स्वीकार करने में क्यों हिचकिचाते हैं? पक्षी का धर्म यानी स्वतंत्रता का उछाह-भरा आवेग और अपने जमाए-जुटाए से निर्मोह!

बांग्ला के प्रख्यात कथाकार प्रबोध कुमार सान्याल के चर्चित उपन्यास ‘बिबागी भ्रमर’ का यह अनुवाद बांग्ला के माधुर्य को बरकरार रखते हुए संलग्नता और विराग की इस कथा को हम तक पहुँचाता है।

पार्थ, नवेन्दु और हिना की यह कहानी रिश्तों के त्रिकोण की उतनी नहीं है जितनी पक्षी-धर्म  यानी स्वातंत्र्य की चाहना की है। हिना अपनी व्यक्ति-चेतना को पत्नी की उस सीमित परिभाषा में नहीं ढल पाती जिसकी उम्मीद अन्तत: हर पुरुष करने लगता है, वह चाहे अपनी मान्यताओं में कितना भी प्रगतिशील क्यों न हो। पार्थ एक ठिकाना है जहाँ वे दोनों न सिर्फ़ अपना मन खोल पाते हैं, बल्कि स्वयं को भी नए सिरे से देखने की कोशिश करते हैं।

बांग्ला उपन्यासों-कहानियों की पठनीयता का प्रवाह और पात्रों का अपने जीवन-जगत में गहरे तक पैठे होना उन्हें लेखक से मुक्त करके हर पाठक की अपनी रचना बना देता है। यह कौशल इस उपन्यास में भी है। साथ ही है मानव-प्रकृति की अज्ञात तहों में उतरने का साहस जो समाजशास्त्रीय-वैचारिक आग्रहों से नहीं, जीवन को जस का तस देखने, उसे समझने की कोशिश करने और वास्तविकता को यथारूप ग्रहण करने की तैयारी से आता है।

 

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1998
Edition Year 2007
Pages 198p
Price ₹75.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1.5
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Prabodh Kumar Sanyal

Author: Prabodh Kumar Sanyal

प्रबोधकुमार सान्याल

 

प्रसिद्ध साहित्यकार और पत्रकार प्रबोधकुमार सान्याल का जन्म 7 जुलाई, 1905 को कोलकाता के चोरबागान में उनके मामा के घर हुआ था। 1937 से 1941 तक वह साहित्यिक पत्रिका ‘युगान्‍तर’ के सम्पादक रहे। ‘स्वदेश’ के सम्पादक रहने के दौरान उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया। उन्होंने ‘बिजली’ और ‘पाडातिक’ का सम्पादन भी किया।

प्रबोधकुमार को यात्राओं का शौक था। अपने घुमक्कड़ स्वभाव के कारण उन्होंने छह बार पूरे भारत की यात्रा की। इसी दौरान वह हिमालय के कई दुर्गम क्षेत्रों तक भी गए। भारत और नेपाल के अलावा उन्होंने एशिया के कई अन्य देशों के साथ-साथ यूरोप, अमेरिका और रशिया की भी यात्राएँ कीं। ‘महाप्रस्थानेर पाथे’ (1937), ‘रसियारडायरी, देब तात्मा’ हिमालय (2 भाग) और ‘उत्तर हिमालय–चरित’  जैसी किताबें लिखकर उन्होंने बांग्ला के यात्रा-साहित्य को समृद्ध किया। उनकी कृति ‘महाप्रस्थानेर पाथे’ ने बहुत प्रसिद्धि पाई। 1960 में उन्होंने कलकत्ता में हिमालयन एसोसिएशन की स्थापना की। 1968 में उन्हें हिमालयन फ़ाउंडेशन का अध्यक्ष बनाया गया। 1978 में वह उत्तरी ध्रुव के रास्ते नॉर्वे गए।

प्रबोधकुमार मुख्यतः ‘कल्लोल युग’ के उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। ‘कल्लोल’ के अलावा वे ‘बिजली’, ‘स्वदेश’, ‘दुन्दुभी’, ‘पाडातिक’, ‘फॉरवर्ड’ और ‘बांग्लारकथा’ जैसी पत्रिकाओं के लिए भी नियमित रूप से लिखा करते थे। उनका पहला उपन्यास ‘जाजाबार’ 1928 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद ‘प्रिय बांधबी’ (1931), ‘अग्रगामी’ (1936), ‘आँका–बाँका’ (1939), ‘पुष्पधनु’ (1956), ‘बिबागी भ्रमर’, ‘हासुबानु’, ‘बनहंसी’, ‘कांच काटा हीरे’, ‘निशिपद्मा’  जैसे उपन्यास प्रकाशित हुए। अपने उपन्यासों और कहानियों में उन्होंने स्त्री-पुरुष के बीच शारीरिक सम्बन्धों की तुलना में उनके मानवीय और मैत्रीपूर्ण पक्ष पर अधिक बल दिया है। यात्राओं के प्रति उनके अगाध प्रेम ने उनके लेखन को भी बख़ूबी प्रभावित किया है, इसलिए उनके पात्रों के जीवन में विविधता दिखाई पड़ती है। प्रबोधकुमार अपने पात्रों के जटिल जीवन का चित्रण भी सरल लेकिन प्रभावी भाषा में करते हैं। साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय के ‘स्वर्णपदक’; ‘शिशिर कुमार’ और ‘मोतीलाल पुरस्कार’; ‘शरत’ और ‘आनन्‍द पुरस्कार’ जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

17 अप्रैल, 1983 को प्रबोधकुमार का देहावसान हुआ।

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