Nadi Ghar

Poetry
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Nadi Ghar
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यह जीवन के साथ एक सहयात्री की तरह चलती जीवन जैसी ही लम्बी कविता है। किसी बड़ी भीतरी या बाहरी घटना-दुर्घटना की प्रतिक्रिया से उपजी हुई नहीं, बल्कि जीवन के रोजमर्रा के साथ बतियाती हुई कविता।

लेकिन जीवन से आक्रांत कविता नहीं, न ही उसके हर ओर फैले विराट वैभव से भयभीत। एक धीमी बतकही की तरह यह अपनी आँख से अपने आसपास के संसार को, व्यक्ति को, उसके इर्द-गिर्द बुने गुए रिश्तों के संजाल को, भीड़ को, भीड़ के बीच भटकती व्यर्थता को देखती हुई, और इन सबके बारे में कुछ कहती-सुझाती-बताती हुई।

'प्रार्थनारत ज़िन्दगी मुझे क्रोधित नहीं करती। क्योंकि मैं जानता हूँ। ये मजबूर लोग जो कुछ माँग रहे हैं। बस वही इन्हें नहीं मिलना है।' कवि इस कविता में जैसे संसार के बीच अपने होने का ऋण चुकता करते हुए अनेक चीजों की तरफ इशारा करता है। प्रकृति में निहित आखिरी उम्मीद को भी हमारे ध्यान में लाता है और हमारे समाज के भीतर की नकारात्मकता को भी जिसके चलते कई बार हमारा पल-पल व्यथा का बिम्ब होकर रह जाता है।

कवि इस कविता के बारे में अपनी बात रखते हुए कहता है कि नदी घर एक ऐसी यात्रा पर निकलने का प्रयास है जो इस दुनिया को उन ताकतों से मुक्ति दे जिनके चलते घर कारागार हो गए हैं और हमारा अपना वजूद एक बोझ

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2021
Edition Year 2021, Ed. 1st
Pages 101p
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20.5 X 13.5 X 1
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Editorial Review

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Author: Krishna Kishore

कृष्ण किशोर

कृष्ण किशोर सेंट पॉल, मिनिसोटा, यूएसए में रहते हैं।

2004 से 2011 तक ‘अन्यथा’ पत्रिका का संचालन-संपादन। कुछ समय के लिए अंग्रेजी पत्रिका Otherwise का संपादन। ‘अन्यथा साहित्य संवाद परिसर’ के संस्थापक।

भारत और यूएसए में लंबे समय तक अंग्रेजी का अध्यापन।

युवावस्था से ही कविता और नाटक मंचन/ निर्देशन में गहरी रुचि। कई सामाजिक, साहित्यिक सहयोगी संगठनों में सक्रिय भागीदारी।

एक कविता संग्रह अन्यथा तथा विभिन्न साहित्यिक- सामाजिक विषयों पर एक लेख-संग्रह संघर्ष यात्रा का पहला पड़ाव प्रकाशित। भारत और यूएसए में अनेक विषयों पर लेख तथा कविताएँ प्रकाशित।

राष्ट्रपति द्वारा ‘पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार’ से सम्मानित।

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