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Muktibodh : Gyan Aur Samvedana-Hard Cover

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9788171789528
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सुधी समीक्षक नंदकिशोर नवल की मुक्तिबोध पर लिखी गई यह पुस्तक दो खंडों में विभक्त है। पहले खंड में मुख्यतः उनके ‘ज्ञान’ का विश्लेषण है और दूसरे खंड में मुख्यतः उनकी ‘संवेदना’ का। लेकिन यह विभाजन केवल सुविधा की दृष्टि से है, नवल जी ने मुक्तिबोध को यथासम्भव अविभाज्य रूप में देखने और दिखाने की कोशिश की है। अध्ययन कविता पर केन्द्रित है, लेकिन प्रसंगवश इसमें उनके आलोचना-साहित्य, कथा-साहित्य और उनकी राजनीतिक टिप्पणियों की भी छानबीन की गई है।

मुक्तिबोध की कविता पर विचार करते हुए नवल जी ने उनकी मार्क्सवादी विश्वदृष्टि एवं राजनीतिक चेतना, उनके आत्मसंघर्ष, उनकी ओजपूर्ण भावना, विराट कल्पना और विश्लेषणात्मक बुद्धि की गहरी छानबीन की है और इस सन्दर्भ में अन्य विद्वान आलोचकों के मतों को भी जाँचा-परखा है। मुक्तिबोध की प्रगीतात्मकता, फैंटेसी और भाषा पर भी विस्तार से विचार किया गया है और परिशिष्ट में मुक्तिबोध की सर्वाधिक चर्चित एवं महत्त्वपूर्ण कविता ‘अँधेरे में’ का विश्लेषण किया गया है। दूसरे शब्दों में मुक्तिबोध पर यह पहली मुकम्मल किताब है।

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Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 1994
Edition Year 2019, Ed. 2nd
Pages 492
Price ₹995.00
Publisher Rajkamal Prakashan
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Nandkishore Nandan

Author: Nandkishore Nandan

नंदकिशोर नन्दन

जन्म : 28 फरवरी, मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार)। निम्न मध्यवर्गीय परिवार। 

शिक्षा : हिन्दी से एम.ए., पीएच.डी.। स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ़्फ़रपुर के प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष पद से अवकाशोपरान्त लेखन एवं सामाजिक कार्यों में निरन्तर सक्रिय। 

प्रकाशित कृतियाँ : ‘अभी अन्त नहीं’ (उपन्यास); ‘नाटक घर’ (कहानी-संग्रह); ‘छूती हुई दूरियाँ’, ‘ये मेरे शब्द’ (कविता-संग्रह); ‘किस कल के लिए’, ‘जब गांधी चुनाव लड़े’, ‘मेरा वतन कहाँ है’ और ‘आग हुए हम’ (गीत-संग्रह); ‘गायक स्वच्छन्द हिमाचल का’, ‘रहबर और रहनुमा प्रेमचन्द’, ‘युग द्रष्टा : कवि गोपाल सिंह नेपाली’, ‘स्वप्न हूँ भविष्य का’, केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात' : सांस्कृतिक चेतना के कवि’ (आलोचना); ‘संगीत मन को पंख लगाए’ (मन्ना डे पर केन्द्रित)।

शीघ्र प्रकाश्य : ‘दाग़ पुराना छूटत नाहीं’ (उपन्यास); ‘नंगे धड़ पर...’ (कहानी-संग्रह); ‘ख़ुशबू बनकर बिखर गया हूँ’ (ग़ज़ल-संग्रह); ‘हरसिंगार हैं खिले’ (प्रेम-गीतों का संग्रह); ‘उलझन मियाँ की वापसी’ (व्यंग्य-संग्रह); ‘समकालीन कविता का मुक्ति-संघर्ष’ (आलोचना); ‘हिन्दू होने की अन्तर्वेदना’ (सामयिक प्रसंगों पर आलेख) 

सम्पादन : ‘हस्तक्षेप’ एवं ‘युगावलोकन’ अनियतकालीन पत्रिकाओं का सम्पादन। नेपाली के शताब्दी वर्ष में उनके सभी सातों संग्रहों का सम्पादन—‘गोपाल सिंह ‘नेपाली’ की श्रेष्ठ कविताएँ’ एवं ‘गोपाल सिंह ‘नेपाली’ की संकलित कविताएँ’। 

सम्मान : ‘नागार्जुन पुरस्कार’ (राजभाषा विभाग, बिहार सरकार), ‘शील सम्मान’, ‘हिन्दी साहित्य सेवी सम्मान’ (बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना), ‘बी.पी. मंडल सम्मान’ (राजभाषा विभाग, बिहार सरकार) आदि।

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