Mrityunjayee

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‘मृत्युंजयी’ का मुख्यराग है—लोक मुक्ति। दलित, शोषित, उपेक्षित, प्रताड़ित, पीड़ित; आर्थिक, सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक दृष्टि से सर्वथा उपेक्षित और अज्ञान के अन्धकार में भटकते अज्ञानी लोगों की बिलखती चेतना के रेगिस्तानी समुद्र में आस्था और संकल्प की सुगम राह बना डालने की युक्ति : “करो उपकृत धरा लोक को/अपना ज्ञान बाँटकर उनको/श्रम से मंडित जग जीवन है/यह रहस्य बतला कर उनको।”

“अपने सत्कर्मों से मानव/जीवन काल बढ़ा सकता है/धर्म आचरण से आत्मा को/वह उदात्त बना सकता है।”

कवि ने यहाँ तत्त्व के लिए संघर्ष किया है, अभिव्यक्ति को सक्षम बनाने के लिए संघर्ष किया है और लोक दृष्टि विकसित करने के लिए जन संघर्ष को अनिवार्य माना है : “मिटा भूत के पद्चिन्हों को/भूल पुराने व्यथा-व्यंग्य को/नई राह पर कदम बढ़ाकर/नई कहानी लिख डाला है/एक नया संसार बनाकर।”

‘मृत्युंजयी’ पढ़कर आप एक ऐसे फूल की कल्पना कर सकते है जो कभी जुही भी हो जाता है तो कभी कमल, कभी मौलश्री, कभी अमलतास तो कभी शेफालिका। ‘मृत्युंजयी’ पढ़ने और उसकी संवेदना के आन्तरिक सतह का स्पर्श करने के पश्चात आपको सहज अनुभव होगा कि महाकवि भागवत झा ‘आज़ाद’ अपने शब्दों से जीवन की परिधि का विस्तार करते हैं। उनकी कविता मानव मन में उच्चतर जीवन मूल्यों के प्रति उत्कंठा और आस्था जगाती है और इस तरह मानवीय नश्वरता के विरुद्ध शाश्वरता का जयगान करती है।

More Information
Language Hindi
Format Hard Back
Publication Year 2022
Edition Year 2022, Ed. 1st
Pages 328
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14.5 X 2.5
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Bhagwat Jha Azad

Author: Bhagwat Jha Azad

भागवत झा आज़ाद

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर राजनेता, साहित्यकार और समाजसेवी भागवत झा आज़ाद का जन्म 28 नवंबर, 1922 को हुआ था। छात्र जीवन से ही वे स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े। जेल गए, यातनाएँ सहीं, पढ़ाई भी बाधित हुई, किन्तु मनोबल नहीं गिरने दिया। यहीं से ‘आज़ाद’ शब्द उनके नाम के आगे जुड़ गया। वे रवीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गाँधी तथा जवाहरलाल नेहरू से प्रभावित थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर के ‘एकला चलो’ भाव को एक कर्मयोगी की तरह आत्मसात कर संघर्ष पथ पर बढ़ते गए। बाद में पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में राजनीति के क्षेत्र में उतरे। समाज में लोकप्रियता के कारण गोड्डा से सांसद बने। फिर भागलपुर से सांसद बने। इन्दिरा गाँधी की सरकार में केन्द्रीय राज्यमंत्री बने। 14 फरवरी, 1988 से 10 मार्च, 1989 तक अविभाजित बिहार के मुख्यमंत्री रहे। अपने जमाने में बिहार की राजनीति में ‘शेर-ए-बिहार’ के नाम से जाने जाते थे। इन सभी गतिविधियों में संलग्न रहते हुए भी आज़ाद के भीतर का साहित्यकार सतत् सक्रिय रहा। उनकी साहित्यिक चेतना अत्यन्त प्रखर थी। उनके अकेलेपन का साथी साहित्य ही था जहाँ उन्हें सन्तोष मिलता था। छायावाद की प्रमुख कवयित्री महादेवी वर्मा जी से उनका संवाद और पत्राचार लगातार होता था। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के साथ उनका आत्मीय सम्बन्ध था। भवानी प्रसाद मिश्र, कन्हैयालाल नन्दन, धर्मवीर भारती, योगेन्द्र सिंह, डॉ. रघुवंश सरीखे साहित्यकारों से उनका आत्मीय सरोकार था।

4 अक्टूबर, 2011 को आज़ाद का निधन हो गया।

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