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Lohe Ki Kamarpetiyan-Paper Back

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9788171196166
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स्वर्गीय तापी धर्माराव के लेखन का फ़ोकस मुख्यत: समाज सुधार रहा है। तेलगू में इनकी पुस्तकें लोकप्रियता के शिखर पर रही हैं। इस पुस्तक में विख्यात लेखक ने कमरपेटियों की परम्परा और इतिहास को अपना विषय बनाया है।

कमरपेटियाँ हमारी परम्परा में जड़ी यौन–वर्जनाओं, पुरुष–वर्चस्व और शुद्धतावादी नैतिक आग्रहों की चरम और सर्वाधिक नृशंस अभिव्यक्ति हैं। इस पुस्तक में कमरपेटियों के इतिहास, उनके समाज–नीतिशास्त्र और वर्तमान में उनके लोक–प्रचलित अवशेषों का सरल, जनसाधारण की भाषा में विवरण दिया गया है। लेखक बताते हैं कि मरुगुबिल्लाओं (लाज–रक्षक पदक) के रूप में आज आन्ध्र में जो आभूषण प्रचलित है, वह कमरपेटियों का ही इमिटेशन है। उसके अलावा पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों और खुदाइयों में मिली कमरपेटियों, उनके प्रकारों और उनसे जुड़ी किंवदन्तियों के बारे में प्रामाणिक जानकारी इस पुस्तक में है।

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator C. Vasanta
Editor Not Selected
Isbn 10 8171196160
Publication Year 2001
Edition Year 2001, Ed. 1st
Pages 79p
Price ₹25.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 18.5 X 12 X 0.5
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Tapi Dharma Rao

Author: Tapi Dharma Rao

तापी धर्माराव

जन्म : 19 सितम्बर, 1887

कवि, आलोचक, नाटककार, समाजसेवी, प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन और वेगुचुक्क ग्रन्थालय के संस्थापक।

प्रमुख कृतियाँ : ‘पेल्लिदानि पुट्टु पूर्वोत्तरालु, ‘देवालयाल मीद बूतु बोम्मलु ऐंदुक’, ‘इनपकच्चडालु’, ‘रालू-रप्पलु’, ‘मस्वु तेरलु’, ‘कोत्त पाली’, ‘पात पाली’, ‘साहित्य मोरमरालु’, ‘आल इंडिया अडुक्कु तिनेवाल्ल महासभा’ आदि।

निधन : 8 मई, 1973

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