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Kosh Kala-Hard Cover

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9788180311772
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‘कोश निर्माण' की विधा पर लिखी गई विश्व साहित्य में यह पहली पुस्तक है। वर्मा जी ‘हिन्दी शब्द सागर’ के अन्यतम सम्पादकों में से थे। वही एक ऐसे सम्पादक भी थे जिन्होंने आरम्भ से अन्त तक, अपने इस दायित्व का निर्वाह किया। इसके उपरान्त उन्होंने ‘संक्षिप्त शब्द सागर’, ‘उर्दू हिन्दी कोश’, ‘प्रामाणिक हिन्दी’ तथा ‘मानक हिन्दी कोश’ की भी रचना की। इस प्रकार उनके जीवन का अधिकांश कोश-निर्माण में ही व्यतीत हुआ। ‘कोशकला’ को उनके कोश-निर्माण काल के अनुभवों का निचोड़ कहें तो अत्युक्ति न होगी।

‘कोश-निर्माण’ का कार्य विज्ञान भी है और कला भी। कोश की रचना का आधार वैज्ञानिक पद्धति तथा नियम हैं इसलिए यह विज्ञान है। जो सत्य है और सुन्दर है उसकी अभिव्यक्ति इसका सरोकार है, इसलिए यह कला है। वर्मा जी ने कोश निर्माण के हर पहलू पर इस कृति में गम्भीरता और सूक्ष्मता से विचार किया है।

‘कोशकला’ के प्रस्तुत संस्करण में नए तथ्यों का समावेश तो हुआ ही है, कई नई प्रस्थापनाओं पर भी पुनर्विचार हुआ है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2007
Edition Year 2007, Ed. 1st
Pages 160p
Price ₹150.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 21 X 14 X 1
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Ramchandra Verma

Author: Ramchandra Verma

रामचन्द्र वर्मा

रामचन्‍द्र वर्मा का जन्म सन् 1890 में काशी के एक सम्मानित खत्री परिवार में हुआ था। वर्मा जी की पाठशालीय शिक्षा साधारण ही थी, किन्तु अपने विद्याप्रेम के कारण उन्होंने विद्वानों के संसर्ग तथा स्वाध्याय द्वारा हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू, फ़ारसी, मराठी, बांग्ला, गुजराती, अंग्रेज़ी आदि कई भाषाओं का अच्छा अध्ययन कर लिया था। उन्‍होंने विभिन्न भाषाओं के ग्रन्थों के आदर्श अनुवाद प्रस्तुत किए हैं, जिनमें ‘हिन्दू राजतंत्र’, ‘ज्ञानेश्वरी’, ‘छत्रसाल’ आदि पुस्तकें उल्‍लेखनीय हैं।

वर्मा जी की स्थायी देन भाषा के क्षेत्र में है। अपने जीवन का अधिकांश उन्होंने शब्दार्थनिर्णय और भाषापरिष्कार में बिताया। उनका आरम्भिक जीवन पत्रकारिता का रहा। वे सन्‌ 1907 में 'हिन्दी केसरी' के सम्पादक हुए। फिर 'बिहार बन्धु' का योग्यतापूर्वक सम्पादन किया। बाद में ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ के सम्पादक-मंडल में रहे। वे ‘नागरी प्रचारिणी सभा’, काशी से सम्पादित होनेवाले 'हिन्दी शब्दसागर' में सहायक सम्पादक नियुक्त हुए, जिसमें 1910 से 1929 तक कार्य किया। बाद में उन्हें 'संक्षिप्त हिन्दी शब्दसागर' के सम्‍पादन का भार सौंपा गया।

वर्मा जी की अनूठी हिन्दी-सेवा के कारण भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित किया था। अन्तिम काल में उन्होंने हिन्दी का एक बृहत्‌ कोश 'मानक हिन्दी कोश' के नाम से तैयार किया, जो पाँच खंडों में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ से प्रकाशित हुआ।

उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं—‘अच्छी हिन्दी’, ‘हिन्‍दी प्रयोग’, ‘कोश कला’, ‘उर्दू-हिन्दी कोश’, ‘उर्दू-हिन्‍दी-अंग्रेज़ी त्रिभाषी कोश’, ‘लोकभरती बृहत् प्रामाणिक हिन्दी कोश’, ‘लोकभरती प्रामाणिक हिन्‍दी बाल-कोश’ आदि।

सन्‌ 1969 में उनका निधन हुआ।

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