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Jan Gopal : Sant Dadu Ke Jivanikar-Hard Cover

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हालाँकि आज उन्हें बहुत लोग नहीं जानते, लेकिन जन गोपाल आरम्भिक आधुनिक भारत के एक महत्त्वपूर्ण देशज बुद्धिजीवी थे।

‘जन गोपाल : संत दादू के जीवनीकार’ पुस्तक के लेखकों का कहना है कि ऐसे कई निर्गुण भक्त कवि रहे हैं जिन पर उनकी काव्य-मेधा और ऐतिहासिक अहमियत के बावजूद उतना ध्यान नहीं दिया गया जितने के वे हक़दार थे। उन्नींसवीं सदी के राजस्थानी कवि एवं कथावाचक जन गोपाल भी ऐसी ही प्रतिभा हैं। यह पुस्तक उनके जीवन और कृतित्व पर केन्द्रित एक अभूतपूर्व अध्ययन है।

जन गोपाल किसी आम निर्गुणपंथी भक्त के साँचे में पूरी तरह फ़िट नहीं बैठते। उनका जन्म एक व्यापारी परिवार में हुआ;  निर्गुण पंथ का चुनाव उन्होंने किसी पारिवारिक या सामाजिक परम्परा के चलते नहीं, बल्कि अपने सचेत निजी निर्णय के आधार पर किया। उन्होंने अपने साहित्य में न केवल छन्दशास्त्र, काव्य-परम्परा और शास्त्रीय हिन्दुस्तानी संगीत के अपने अद्भुत ज्ञान का बल्कि एक नागर तथा प्रगतिशील संवेदना का भी परिचय दिया। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘दादू जनम लीला’ का नाम सबसे पहले आता है जो उनके गुरु और अकबर के समकालीन दादू दयाल की जीवन-गाथा है। भागवत पुराण की कथाओं को भी उन्होंने अपने काव्य में पिरोया जिनमें ‘प्रह्लाद चरित्र’, ‘ध्रुव चरित्र’ और ‘जड़ भरत चरित्र’ मुख्य हैं।

इस पुस्तक में स्पष्ट होता है कि जन गोपाल का विशेष महत्त्व इसलिए है कि उन्होंने लोक-प्रचलित पौराणिक कथाओं को अपनी हिन्दी व ब्रज रचनाओं में समकालीनता का एक सूक्ष्म तेवर दिया। साथ ही इन कथाओं के नैतिक पक्ष को नए रूप में रचने की प्रक्रिया में उन्होंने पारम्परिक धर्मशास्त्र के मूल तत्त्व पर भी नई दृष्टि डाली और भक्ति को एक समतावादी और मुक्तिकारी रूप में प्रस्तुत किया।

जन गोपाल के जीवन और कृतित्व के विश्लेषण के साथ और भक्ति परम्परा में उन्हें उनका उचित स्थान देते हुए लेखकों ने इस पुस्तक में उनके रचे तीनों चरित्रों (प्रह्लाद, ध्रुव और भरत) के साथ ही उनके बीस पद भी प्रस्तुत किए हैं।

देशज बौद्धिक परम्पराओं और निर्गुण भक्ति के अध्ययन के लिए यह पुस्तक ​निस्सन्देह महत्त्वपूर्ण है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 232p
Price ₹795.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2
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Author: David N. Lorenzen

डेविड लॉरेंजन

उन इने-गिने इतिहासकारों में से हैं, जिनकी खोजों और विश्लेषणों ने प्राचीन से लेकर आरम्भिक आधुनिक काल तक के भारतीय इतिहास-लेखन पर स्थायी छाप छोड़ी है।

डेविड ने आठवें दशक के मध्य से कबीरपंथ के व्यवस्थित अध्ययन का श्रीगणेश किया। यह अध्ययन कबीर और अन्य निर्गुण सन्तों के काव्य, उनके सामाजिक प्रभाव और कबीरपंथ के विकास पर अत्यन्त विचारोत्तेजक विचार से लेकर, अठारहवीं सदी में, उत्तरी बिहार में सक्रिय इटालियन पादरी मारको देला तोंबा की ‘आत्मकथा’ लिखने तक जा पहुँचा है। इसी अध्ययन-यात्रा के कुछ महत्त्वपूर्ण पड़ावों का बोध करानेवाले नौ निबन्ध यहाँ संकलित हैं।

इन निबन्धों के अलावा, अनन्तदास की कबीर-परिचई का विस्तृत, विचारोत्तेजक भूमिका के साथ, अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित करने के साथ, कबीरपंथ और निर्गुण संवेदना के सांस्कृतिक इतिहास के बारे में अनेक निबन्ध लिखने के साथ ही डेविड लॉरेंजन ने ‘रिलीजन, स्किन कलर एंड लैंग्वेज : आर्य एंड नॉन-आर्य इन वैदिक पीरियड’, ‘दि रिलीजियस आइडियोलॉजी ऑफ़ गुप्त किंगशिप’ तथा ‘हू इंवेंटेड हिन्दुइज़्म’ जैसे बहुचर्चित और विचारोत्तेजक निबन्ध भी प्रकाशित किए हैं।

पिछले कई बरसों से डेविड लॉरेंजन मेक्सिको के प्रतिष्ठित शोध संस्थान ‘कॉलेजियो दि मेक्सिको’ में प्रोफ़ेसर हैं। उनके व्यक्तित्व में गहन जिज्ञासा और गम्भीर अध्ययन से उत्पन्न गहराई के साथ ही है चुंबकीय सहजता और खुलापन। ‘हाथी चढ़िए ज्ञान का सहज दुलीचा डारि’ की सलाह को अपने जीवन और व्यक्तित्व में डेविड ने सोलहों आने चरितार्थ किया है।

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