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Hindi Prayog-Hard Cover

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9788180311291
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किसी भाषा के मानक रूप के निर्धारण में अनेक शताब्दियों का योगदान रहता है। इसलिए उस भाषा के हर शुभचिन्तक को मनमाने प्रयोग करने से बचाना चाहिए। मनमाने प्रयोगों से भाषा का स्वरूप बिगड़ता है और उच्छृंखल प्रयोगों से तो उसकी उपयोगिता तथा विश्वसनीयता भी घटती है। नदी की भाँति भाषा का प्रवाह भी कुछ सीमाओं के भीतर ही भला लगता है।

गत साठ से ज़्यादा वर्षों से वर्मा जी की यह अनोखी कृति ‘हिन्दी प्रयोग’ विद्यार्थियों को अपनी भाषा का स्वरूप परम निर्मल और उज्ज्वल बनाने के लिए प्रेरित करती रही है। असंख्य विद्यार्थियों ने इस पुस्तक से लाभ उठाया है और अपनी भाषा को अशुद्धियों और त्रुटियों से बचाया है। जो लोग अच्छी हिन्दी सीखना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक बड़े काम की चीज़ है। जाने-अनजाने होनेवाली सैकड़ों प्रकार की भूलों से पीछा छुड़ाने में तथा भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करने में वर्मा जी की ‘हिन्दी प्रयोग’ आज भी निश्चित रूप से समर्थ है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Edition Year 2009
Pages 152p
Price ₹595.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 1.5
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Ramchandra Verma

Author: Ramchandra Verma

रामचन्द्र वर्मा

रामचन्‍द्र वर्मा का जन्म सन् 1890 में काशी के एक सम्मानित खत्री परिवार में हुआ था। वर्मा जी की पाठशालीय शिक्षा साधारण ही थी, किन्तु अपने विद्याप्रेम के कारण उन्होंने विद्वानों के संसर्ग तथा स्वाध्याय द्वारा हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू, फ़ारसी, मराठी, बांग्ला, गुजराती, अंग्रेज़ी आदि कई भाषाओं का अच्छा अध्ययन कर लिया था। उन्‍होंने विभिन्न भाषाओं के ग्रन्थों के आदर्श अनुवाद प्रस्तुत किए हैं, जिनमें ‘हिन्दू राजतंत्र’, ‘ज्ञानेश्वरी’, ‘छत्रसाल’ आदि पुस्तकें उल्‍लेखनीय हैं।

वर्मा जी की स्थायी देन भाषा के क्षेत्र में है। अपने जीवन का अधिकांश उन्होंने शब्दार्थनिर्णय और भाषापरिष्कार में बिताया। उनका आरम्भिक जीवन पत्रकारिता का रहा। वे सन्‌ 1907 में 'हिन्दी केसरी' के सम्पादक हुए। फिर 'बिहार बन्धु' का योग्यतापूर्वक सम्पादन किया। बाद में ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ के सम्पादक-मंडल में रहे। वे ‘नागरी प्रचारिणी सभा’, काशी से सम्पादित होनेवाले 'हिन्दी शब्दसागर' में सहायक सम्पादक नियुक्त हुए, जिसमें 1910 से 1929 तक कार्य किया। बाद में उन्हें 'संक्षिप्त हिन्दी शब्दसागर' के सम्‍पादन का भार सौंपा गया।

वर्मा जी की अनूठी हिन्दी-सेवा के कारण भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' से सम्मानित किया था। अन्तिम काल में उन्होंने हिन्दी का एक बृहत्‌ कोश 'मानक हिन्दी कोश' के नाम से तैयार किया, जो पाँच खंडों में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ से प्रकाशित हुआ।

उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं—‘अच्छी हिन्दी’, ‘हिन्‍दी प्रयोग’, ‘कोश कला’, ‘उर्दू-हिन्दी कोश’, ‘उर्दू-हिन्‍दी-अंग्रेज़ी त्रिभाषी कोश’, ‘लोकभरती बृहत् प्रामाणिक हिन्दी कोश’, ‘लोकभरती प्रामाणिक हिन्‍दी बाल-कोश’ आदि।

सन्‌ 1969 में उनका निधन हुआ।

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