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Garha Ka Gond Rajya-Hard Cover

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यह पुस्तक भारत के मध्य भाग के इतिहास के एक विस्मृत अध्याय को और गोंडों के गौरवशाली अतीत को उजागर करनेवाला एक दस्तावेज़ है। गढ़ा का गोंड राज्य बहुधा मुग़ल सम्राट अकबर की सेना से लोहा लेनेवाली वीरांगना रानी दुर्गावती के सन्दर्भ में ही याद किया जाता है और शेष इतिहास एक धुँधले आवरण से आवृत रहा है। यह आश्चर्य की बात है कि केवल दो सौ साल पहले समाप्त होनेवाले इस विशाल देशी राज्य के बारे में अभी तक बहुत कम जानकारी रही है।

इस कृति में लेखक ने फ़ारसी, संस्कृत, मराठी, हिन्दी और अंग्रेज़ी स्रोतों के आधार पर गढ़ा राज्य का प्रामाणिक एवं क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया है। वे सभी कड़ियाँ जोड़ दी गई हैं, जो अभी तक अज्ञात थीं। पुस्तक बताती है कि पन्द्रहवीं सदी के प्रारम्भ में विंध्य और सतपुड़ा और विन्ध्याचल के अंचल में गोंड राजाओं ने जिस राज्य की स्थापना की वह क्रमशः गढ़ा, गढ़ा-कटंगा और गढ़ा-मंडला के नाम से विख्यात हुआ। गढ़ा का गोंड राज्य यद्यपि सोलहवीं सदी में मुग़लों के अधीन हो गया, तथापि न्यूनाधिक विस्तार के साथ यह अठारहवीं सदी तक मौजूद रहा। सोलहवीं सदी में अपने चरमोत्कर्ष काल में यह राज्य उत्तर में पन्ना से दक्षिण में भंडारा तक और पश्चिम में भोपाल से लेकर पूर्व में अमरकंटक के आगे लाफागढ़ तक फैला हुआ था और 1784 में मराठों के हाथों समाप्त होने के समय भी यह वर्तमान मंडला, डिंडोरी, जबलपुर, कटनी और नरसिंहपुर ज़िलों और कुछ अन्य क्षेत्रों में फैला था। यह विस्तृत राज्य पौने तीन सौ वर्षों तक लगातार अस्तित्व में रहा, यह स्वयं में एक उल्लेखनीय बात है।

राजनीतिक विवरण के साथ ही यह कृति उस काल की सांस्कृतिक गतिविधियों का परिचय देते हुए बताती है कि आम धारणा के विपरीत गोंड शासक साहित्य, कला और लोक कल्याण के प्रति भी जागरूक थे।

 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2008
Edition Year 2023, Ed. 2nd
Pages 305p
Price ₹995.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2.5
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Suresh Mishra

Author: Suresh Mishra

सुरेश मिश्र

जन्म : 9 नवम्बर, 1937; महाराजपुर, मंडला (मध्य प्रदेश)।

शिक्षा : एम.ए. इतिहास 1960 (विक्रम), पीएच.डी. 1973 (सागर)।

1960-98 तक मध्य प्रदेश के शासकीय महाविद्यालयों में इतिहास का अध्यापन।

प्रमुख कृतियाँ : ‘अकबर’, ‘गढ़ा के गोंड राज्य का उत्थान और पतन’, ‘पश्चिमोत्तर सीमान्त नीति’ (1839-1947), ‘रानी दुर्गावती’, ‘मध्य प्रदेश के गोंड राज्य’, ‘भारत का इतिहास’ (1740-1857), ‘1857—मंडला के दस्तावेज़’, ‘1857—रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई’, ‘1857—मध्य प्रदेश के रणबाँकुरे’, ‘1842 के विद्रोही हीरापुर के हिरदेशाह’, ‘इतिहास के पन्नों से’, ‘क़ाफ़ि‍ले यादों के’, ‘ट्राइबल्स असेंडेंसी इन सेंट्रल इंडिया—द गोंड किंगडम ऑफ़ गढ़’।

सम्‍पादन : ‘मालवा और निमाड़ का इतिहास’ (1994); ‘मालवा और बुन्देलखंड’ (1996); ‘साहित्य में इतिहास’ (1998); ‘मध्ययुगीन मध्य प्रदेश’ (1998); ‘संधान’-1 (झाँसी) (2003); ‘संधान’-2 (झाँसी) (2004); ‘संधान’-3 (झाँसी) (2005); ‘संधान’-4 (झाँसी) (2006); ‘संधान’-5 (झाँसी) (2007)।

अनुवाद : ‘भारतीय संस्कृति पर इस्लाम का प्रभाव’, ‘ख़लजी वंश का इतिहास’, ‘लोक प्रशासन’, ‘भारतीय कृष्णमृग’, ‘मिथ्स ऑफ़ मिडिल इंडिया’।

हिन्दी संक्षिप्तीकरण : ‘आधी दुनिया भूखी क्यों’ (दूसरा संस्करण); ‘बहुराष्ट्रीय कम्पनियों पर सरकारें मेहरबान’, ‘दुनिया की भुखमरी : 12 ग़लतफ़हमियाँ’।

निधन : 22 अप्रैल, 2021

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