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Fasadat Ke Afsane-Hard Cover

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1947 से अब तक हमारी राजनीति फ़सादात करानेवाले को पहचानने में, उसे नंगा करने में आगे नहीं आई। कारण ये कि फ़सादात कराना सारे देश की राजनीति के दाँव-पेच का अंग बन चुका है। राजनीति से जुड़े सारे दल एक दूसरे को इल्ज़ाम देते रहते हैं लेकिन फ़सादात की जाँच करनेवाले कमीशन कुछ और कहते हैं। इन सबसे अलग फ़सादात का जो चेहरा अपने असली रूप में हमारे सामने आता है वो केवल साहित्यकार, रचनाकार के ज़रिए ही आता है। लेखक और रचनाकार ही ने फ़सादात के बारे में सच-सच लिखा है। उसी ने फ़सादात के मुजरिम को पहचाना है। दु:ख झेलनेवाले के दु:ख को समझा है।

इस संग्रह में कुछ अफ़साने तो वो हैं जो बँटवारे के फ़ौरन बाद होनेवाले साम्प्रदायिक दंगों पर लिखे गए और कुछ वो हैं जो बाबरी मस्जिद के गिराए जाने से पहले और उसके बाद होनेवाले फ़सादात पर लिखे गए। इनमें कई अफ़साना-निग़ार ऐसे भी हैं जो ख़ुद इस तूफ़ान से गुज़रे थे। फ़सादात के कारण बदलते रहे और साथ ही उनके बारे में लेखक का रवैया भी बदलता रहा, फ़सादात का अधिकतर शिकार बननेवाला समुदाय लेखक की सारी सहानुभूति समेटने लगा। वे राजनैतिक दल भी पहचान लिए गए जो फ़सादात की आग लगाते रहते हैं। पहले के अफ़सानों में हिन्दू मुसलमान की और मुसलमान हिन्दू की जानो-माल की हिफ़ाज़त करते हैं लेकिन बाद के फ़सादात में लेखक ने ये महसूस किया कि फ़सादात जब भी भड़कते हैं तो हिन्दू-मुसलमान के मेल-जोल में एक फ़ासला-सा आ जाता है। इस ट्रेजिडी की गूँज ‘नींव की ईंट’, ‘सिंघारदान’, ‘ज़िन्दा दरगोर’ जैसे अफ़सानों में सुनाई देती है।

फ़सादात ने हमारे जीवन और सायकी में एक मुस्तक़िल दहशत और लूटे जाने का ख़ौफ़ और भय पैदा कर दिया है। इस भय, डर और ख़ौफ़ की सायकी को ‘बग़ैर आसमान की ज़मीन’, ‘आदमी’ और ‘खौफ़’ जैसे अफ़सानों में महसूस किया जा सकता है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Isbn 10 8126710446
Publication Year 2005
Edition Year 2005, Ed. 1st
Pages 294p
Price ₹325.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14 X 2
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Zubair Razvi

Author: Zubair Razvi

जुबेर रेज़वी

1936 में अमरोहा के एक मुमताज़ दीनी घराने में पैदा हुए। शुरुआती शिक्षा अमरोहा और हैदराबाद, दकन में। एम.ए. दिल्ली वि.वि. से।

ऑल इंडिया रेडियो में एक विख्यात ब्राडकॉस्टर की छवि बनाते हुए बतौर डायरेक्टर सेवानिवृत्त हुए। दो साल उर्दू अकेडमी दिल्ली के सचिव रहे। केन्द्र सरकार की एक सीनियर फ़ेलोशिप के तहत ‘उर्दू का रिश्ता हिन्दुस्तानी फ़नूने-लतीफा से’ विषय पर काम किया। इसके अलावा हिन्दुस्तानी ललित कलाओं पर ग़ालिब के प्रभाव पर भी उन्होंने महत्त्‍वपूर्ण काम किया है जो किताब के रूप में प्रकाशित है। टीपू सुल्तान और कुली कुतुबशाह पर उनके ओपेरा कई बार मंचित हुए। जुबेर रेज़वी की गिनती उर्दू के मशहूर शायरों में होती है।

1991 से आप त्रैमासिक ‘ज़हने-जदीद’ नियमित रूप से सम्पादित करते रहे। शायर, ब्राडकॉस्टर और पत्रकार जुबेर रेज़वी की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘गर्दिशे-पा’ की ख़ासी प्रशंसा हुई। ‘गर्दिशे-पा’ उनकी उत्कृष्ट गद्य का नमूना है। उनके लेखों की एक पुस्तक ‘उर्दू-फ़ुनून और अदब’ एक बहुचर्चित पुस्तक है।

निधन : 21 फ़रवरी, 2016

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