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Dastan Aur Bhi Hain-Hard Cover

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शेख मुजीबुर रहमान बांग्लादेश के संस्थापक नेताओं में अग्रणी थे। वे दो बार स्वतंत्र बांग्लादेश के राष्ट्रपति भी रहे।

यह पुस्तक बंगबन्धु के रूप में सम्मानित-स्वीकृत शेख मुजीबुर रहमान की आत्मकथा है, जिसे उन्होंने अपने कारावास के दिनों में लिखी थी। इसमें उन्होंने अपने 1955 तक के निजी और सार्वजनिक जीवन का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।

इस पुस्तक से ज़ाहिर होता है कि एक सच्चे जननेता के रूप में उनकी हैसियत कितनी ऊँची थी। अपने देश और अपने लोगों के लिए उन्होंने अपने जीवन को जोखिम में डालकर संघर्ष का एक ऊँचा उदाहरण पेश किया।

प्रथम दृष्ट्या तथ्यों पर आधारित इस आत्मकथा में हमें भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की कुछ झलकियों के अलावा पाकिस्तान आन्दोलन, भाषा आन्दोलन, बांग्लादेश की स्वाधीनता के आन्दोलन और इसके दौरान पाकिस्तानी शासन द्वारा किए गए षड्यंत्रों और दमन से सम्बन्धित अनेक दुर्लभ ऐतिहासिक तथ्यों और कहानियों की जानकारी मिलेगी।

कई वर्षों तक अनुपलब्ध रही इस आत्मकथा को सामने लाने का श्रेय उनकी पुत्री शेख हसीना और उनके अन्य परिजनों को जाता है जिन्होंने अत्यन्त परिश्रम के साथ जर्जर, खस्ताहाल काग़ज़ों में से इस दस्तावेज़ को सम्भव किया।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2017
Edition Year 2018, Ed. 2nd
Pages 331p
Price ₹795.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 2.5
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Author: Shekh Mujibur Rahman

शेख मुजीबुर रहमान

जन्म : 17 मार्च, 1920 बांग्लादेश के संस्थापक नेता एवं प्रथम राष्ट्रपति। उन्हें सामान्यत: बांग्लादेश का जनक कहा जाता है। वे ‘अवामी लीग’ के अध्यक्ष थे। पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सशस्त्र संग्राम की अगुआई करते हुए बांग्लादेश को मुक्ति दिलाई। बांग्लादेश के प्रथम राष्ट्रपति बने और बाद में प्रधानमंत्री भी बने। वे ‘शेख मुजीब’ के नाम से भी प्रसिद्ध थे। उन्हें ‘बंगबन्धु’ की पदवी से सम्मानित किया गया। 15 अगस्त, 1975 की सुबह बांग्लादेश की सेना के कुछ बाग़ी युवा अफ़सरों के हथियारबन्द दस्ते ने ढाका स्थित राष्ट्रपति आवास पर पहुँचकर राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी। हमलावर टैंक लेकर गए थे। पहले उन लोगों ने बंगबन्धु के बेटे शेख कमाल को मारा और बाद में मुजीब और उनके अन्य परिजनों को। मुजीब के सभी तीन बेटे और उनकी पत्नी की बारी-बारी से हत्या कर दी गई। हमले में कुल 20 लोग मारे गए थे। बाग़ी सेना के जवान हमले के समय कई दस्तों में बँटे थे। अप्रत्याशित हमले में मुजीब परिवार का कोई पुरुष सदस्य नहीं बचा। उनकी दो बेटियाँ संयोगवश बच गईं, जो घटना के समय जर्मनी में थीं। उनमें एक शेख हसीना और दूसरी शेख रेहाना थीं। शेख हसीना अभी बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं। अपने पिता की हत्या के बाद शेख हसीना ब्रिटेन में रहने लगी थीं। वहीं से उन्होंने बांग्लादेश के नए शासकों के ख़िलाफ़ अभियान चलाया। 1981 में वह बांग्लादेश लौटीं और सर्वसम्मति से ‘अवामी लीग’ की अध्यक्ष चुन ली गईं।

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