विश्व-दर्शन की मुख्य धारा में विभिन्न कालों के विभिन्न लोगों ने सकारात्मक या नकारात्मक, अपने-अपने तरीक़े से योगदान किया है। इस मुख्य धारा में अनेक धाराएँ मिली हुई हैं, जिनसे सामान्य पाठकों का परिचय कराने के लिए आठ पुस्तकों की यह शृंखला तैयार की गई है। प्रो. देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की प्रस्तुत पुस्तक इसी शृंखला की पहली कड़ी है।
श्री चट्टोपाध्याय इस पुस्तकमाला के प्रधान सम्पादक हैं और साथ ही ‘दर्शनशास्त्र के स्रोत’ शीर्षक प्रस्तुत पुस्तक के लेखक भी। अत: उनकी यह पुस्तक एक प्रकार से पूरी शृंखला की पूर्व-पीठिका है। इस पुस्तक में उन्होंने, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, दर्शन के स्रोतों की खोज की है, और शृंखला की अगली पुस्तकों को पढ़ने-समझने का संस्कार पैदा करने की आधारशिला का निर्माण भी किया है। ‘दर्शनशास्त्र की आवश्यकता क्यों है’ से प्रारम्भ करके वे आदि-मानव के क्रमिक विकास पर विचार करते हैं और फिर समाज में कर्म-विभाजन की शुरुआत, नगर क्रान्ति, जीवन में धर्म की भूमिका आदि को रेखांकित करते हुए इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि दर्शन का जन्म और विकास कैसे हुआ। इस समस्त विवेचन के क्रम में विश्व की प्राचीन चिन्तन-पद्धतियों का संक्षिप्त परिचय भी पाठकों को मिल जाता है।
प्रो. चट्टोपाध्याय ने यहाँ थेल्स के बारे में किए गए इस दावे पर प्रश्न-चिह्न लगाया है कि वह पहला वैज्ञानिक था। ऐसा उन्होंने ‘छान्दोग्य उपनिषद’ के उद्दालक आरुणि से सम्बन्धित अंश का विवेचन करते हुए किया है। उनके अनुसार, उद्दालक आरुणि के विज्ञान के प्रति सुस्पष्ट रुझान को देखते हुए विश्व विज्ञान के इतिहास का गम्भीर पुनरीक्षण आवश्यक है।
कहना न होगा कि प्रो. चट्टोपाध्याय की सामाजिक दृष्टि और बौद्धिक तटस्थता से अनुप्राणित यह पुस्तक दर्शन के अध्येताओं के साथ-साथ उन पाठकों के लिए भी रुचिकर होगी, जो दर्शन के अध्ययन की शुरुआत ही कर रहे हैं।
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back, Paper Back |
| Translator | Sushil Dobhal |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2022 |
| Edition Year | 2024, Ed. 2nd |
| Pages | 120p |
| Price | ₹250.00 |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
| Dimensions | 21.5 X 14 X 1 |