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Bhartiya Darshan Ki Rooprekha-Hard Cover

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सम्पूर्ण भारतीय विचारधारा में दो सामान्य बातें हैं—मोक्ष के सर्वोच्च आदर्श का अनुसरण और उसके लिए जो साधना बताई गई है उसमें व्याप्त वैराग्य की भावना। इन बातों से सिद्ध होता है कि भारतीयों के लिए दर्शन न तो मात्र बौद्धिक चिन्तन है और न मात्र नैतिकता, बल्कि वह चीज़ है जो इन दोनों को अपने अन्दर समाविष्ट भी करती है और इनसे ऊपर भी है। यहाँ दर्शन का लक्ष्य उससे भी अधिक प्राप्त करना है जो तर्कशास्त्र और नीतिशास्त्र से प्राप्त किया जा सकता है। किन्तु यह नहीं भुला देना चाहिए कि तर्कशास्त्र और नीतिशास्त्र यद्यपि स्वयं साध्य नहीं हैं, तथापि दर्शन के लक्ष्य के ये ही एकमात्र साधन हैं। इन्हें ऐसे दो पंख माना गया है जो आध्यात्मिक उड़ान में आत्मा की सहायता करते हैं। इनकी सहायता से जो लक्ष्य प्राप्त होता है, उसका स्वरूप एक ओर तो ज्ञान का है—ऐसे ज्ञान का जिसमें बौद्धिक आस्था की अपरोक्षानुभव में परिणति हो गई हो, और दूसरी ओर वैराग्य का है—ऐसे वैराग्य का जो उसके तात्त्विक आधार की जानकारी से अविचल हो गया हो। वह प्रधानत: शान्ति की मानसिक स्थिति है जिसमें निष्क्रियता का होना अनिवार्य नहीं है।

भारतीय दर्शन का इतिहास इस बात का इतिहास है कि उक्त दो परम्पराओं ने किस प्रकार परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया करके विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदायों को जन्म दिया है।

भारतीय विचारधारा के विकासक्रम में कभी एक सम्प्रदाय अभिभावी रहा और कभी दूसरा। एक समय बौद्धधर्म का स्पष्टत: ज़ोर रहा और ऐसा प्रतीत होता था कि वह स्थायी रूप से अन्यों पर हावी हो गया है, किन्तु अन्त में वेदान्त की विजय हुई।

इस पुस्तक को प्रकाशित करने का उद्देश्य यह है कि यह उन कॉलेजों में, जहाँ भारतीय दर्शन पढ़ाया जाता है, एक पाठ्य-पुस्तक के रूप में प्रयुक्त हो सके। यद्यपि यह मुख्यत: विद्यार्थियों के लिए लिखी गई है, तथापि आशा की जाती है कि यह उन लोगों के लिए भी उपयोगी हो सकेगी जो जानी-पहचानी दार्शनिक समस्याओं के भारतीय विचारकों द्वारा प्रस्तुत समाधानों में रुचि रखते हैं। लेखक का प्रधान उद्देश्य यथासम्भव एक ही जिल्द के अन्दर भारतीय दर्शन का सम्बन्ध और सांगोपांग विवरण देना रहा है; फिर भी पाठक देखेगा कि व्याख्या और आलोचना भी छूटी नहीं है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Editor Not Selected
Publication Year 1965
Edition Year 2018, Ed. 8th
Pages 420p
Price ₹995.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22.5 X 14 X 2.5
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M. Hiriyanna

Author: M. Hiriyanna

एम. हिरियन्ना

जन्म : 7 मई, 1871; मैसूर।

आरम्भिक शिक्षा मैसूर में ही जहाँ उन्होंने संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। स्नातकोत्तर मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास से। उनका व्यावसायिक जीवन मैसूर ओरिएंटल लाइब्रेरी जिसे अब ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट कहा जाता है, में पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में 1891 में शुरू हुआ। यहाँ उन्होंने संस्कृत तथा कन्नड़ की पुस्तकों और पांडुलिपियों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कार्य किया। इसके पश्चात् उन्होंने अध्यापक बनने के इरादे से प्रशिक्षण प्राप्त किया और 1896 में गवर्नमेंट नॉर्मल स्कूल में अध्यापक हो गए और 1907 में यहाँ के प्रधानाचार्य बने। उनके अध्यवसाय को देखते हुए मैसूर विश्वविद्यालय के उप-कुलपति की अनुशंसा पर उन्हें महाराजा कॉलेज, मैसूर में संस्कृत का प्रवक्ता नियुक्त किया गया, जहाँ वे दर्शन विभाग के अध्यक्ष ए.आर. वाडिया के सम्पर्क में आए। इस समय एस. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी यहीं पढ़ाते थे। राधाकृष्णन के सुझाव पर ही उनके क्लास-नोट्स को प्रकाशित किया गया जो ‘भारतीय दर्शन की रूपरेखा’ के रूप में सामने आया। साहित्य, दर्शन और व्याकरण के क्षेत्र में उनका महत्त्वपूर्ण कार्य रहा।

उनका देहावसान 19 सितम्बर, 1950 को हुआ।

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