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Bas Chaand Royega-Paper Back

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मदन कश्यप की कविता इस लोक को सम्बोधित कविता है। वह इसी छोटे लेकिन मनुष्य के लिए फिर भी बहुत बड़े लोक को जीना चाहती है। यह देह जो नश्वर है, उसके लिए बहुत कुछ है क्योंकि इसी देह के झरोखे पर बैठकर आँखें उस दुनिया को देखती हैं जिसे अन्तत: हमें जीना है।

यह कविता कहती है कि ईश्वर हो, लेकिन वह उतना काम्य नहीं है जितना मनुष्यों में मनुष्यता। मनुष्यता की क़ीमत पर वह ईश्वर नहीं चाहिए जिसे वे लोग मनमाने ढंग से इस्तेमाल कर सकें, जो ख़ुद ईश्वर होना चाहते हैं। यह कविता नहीं चाहती कि दुनिया में इतना ज़्यादा ईश्वर हो जाए कि ‘जय श्रीराम’ कहकर किसी मनुष्य को मार देना धार्मिक लगने लगे।

ये कविताएँ विजय के ऊपर शान्ति को तरजीह देती हैं और वीरता के ऊपर जीवन के सातत्य को। इस तरह ये कविताएँ विकास और विध्वंस के दुश्चक्र में फँसे जीवन को एक रास्ता दिखाती हैं।

यह मदन कश्यप का नया संग्रह है। अपनी कविताओं में उन्होंने लोक को, लोक की भाषा को, जीवन में प्रकृति की अनवरत उपस्थिति को और संसार में एक साधारण मनुष्य की महिमा को अत्यन्त ग्राह्य शब्द-चित्रों में साकार किया है।

‘बस चाँद रोएगा’ संग्रह में उनकी इधर की कविताएँ संकलित हैं, इनमें देश का वर्तमान, वर्तमान को अपने स्वार्थों के अनुसार गढ़ती-बदलती राजनीति और कोरोना जैसी महामारी और युद्धों से पैदा हुई विडम्बनाओं के चिह्न भी मौजूद हैं; और इस माहौल में अपनी निजी पीड़ाओं और मानवीय सरोकारों के साथ जीता व्यक्ति भी, और वह उम्मीद, वह प्रेम, वह स्पर्श भी जो विनाश की तमाम कोशिशों के बावजूद बचे रहते हैं। 

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 128p
Price ₹250.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1
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Madan Kashyap

Author: Madan Kashyap

मदन कश्यप

मदन कश्यप का जन्म 29 मई, 1954 को बिहार के वैशाली जनपद के एक गाँव में हुआ। उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं—‘लेकिन उदास है पृथ्वी’, ‘नीम रोशनी में’, ‘कुरुज’, ‘दूर तक चुप्पी’, ‘अपना ही देश’ और ‘पनसोखा है इन्द्रधनुष’ (कविता-संग्रह); ‘कवि ने कहा’, ‘75 कविताएँ’ (संचयन); ‘मतभेद’, ‘लहूलुहान लोकतंत्र’, ‘राष्ट्रवाद का संकट’, ‘लॉकडाउन डायरी’ और ‘बीजू आदमी’ (गद्य)।

वैचारिक आलेख, आलोचना और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणियों का भी नियमित लेखन। मजदूर आन्दोलन की पत्रिका ‘श्रमिक सॉलिडेरिटी’ (धनबाद) से लेकर ‘दि पब्लिक एजेंडा’ (नई दिल्ली) तक कई पत्रिकाओं के सम्पादन से सम्बद्ध रहे। कुछ पुस्तकों का भी सम्पादन किया।

कविताओं का कुछ विदेशी और अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद। विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित समकालीन कविता के संकलनों में रचनाएँ शामिल। बिहार के विश्वविद्यालयों के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में समकालीन कवि के रूप में पढ़ाए जाते हैं। कुछ अन्य पाठ्यक्रमों में भी कविताएँ शामिल। उनके कवि-कर्म पर केन्द्रित तीन पुस्तकें प्रकाशित हैं—‘ज़्यादा प्राचीन है वेदना की नदी’ (ए. अरविंदाक्षन), ‘मदन कश्यप की काव्य चेतना’ (देवशंकर नवीन) और ‘मदन कश्यप का कविकर्म’ (अरुण होता)। दूरदर्शन, आकाशवाणी, साहित्य अकादेमी, नेशनल बुक ट्रस्ट सहित साहित्य के शीर्ष संस्थानों में काव्य-पाठ एवं व्याख्यान। 2008 से 2017 तक दूरदर्शन पर पुस्तक-चर्चा के साप्ताहिक कार्यक्रम ‘शब्द निरन्तर’ का नियमित प्रसारण। इन नौ वर्षों के दौरान लगभग 400 पुस्तकों पर नामवर सिंह के साथ बातचीत।

‘दिनकर राष्ट्रीय सम्मान’ (2024), ‘अज्ञेय शब्द शिखर सम्मान’ (2022), ‘नागार्जुन पुरस्कार’ (2016), ‘केदार सम्मान’ (2015) ‘शमशेर सम्मान’ (2008), ‘बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान’ (1994) सहित अन्य कई सम्मानों से सम्मानित।

सम्पर्क : [email protected]

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