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Bahattar Meel-Paper Back

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9788119989508
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72 मील उपन्यास में लेखक के बचपन की, सातारा से कोल्हापुर तक की तीन दिनों की यात्रा का वर्णन है। यह लेखक के बालमन पर अंकित होनेवाले जीवन के हृदयविदारक अनुभवों की दास्तान है जो इसे इस यात्रा के दौरान हुए। इन तीन में लेखक के मन पर अमिट चिह्न पड़ते हैं, उनका यह जीवंत चित्रण हमें स्तब्ध कर देता है।

तीन दिनों के प्रवास में राधाक्का के साथ जो कुछ घटता है उसमें इस क्षणभंगुर जीवन की सच्चाई सामने आ जाती है। अपनी इस यात्रा में राधाक्का अपने छह बच्चों में से तीन की अकाल मृत्यु के दारुण दुख को चुपचाप सहन करती है। उसकी आशा की किरण राणू जब साँप के डस लेने से प्राण त्याग देता है तब तो राधाक्का का दुख पराकाष्ठा पर जा पहुँचता है।

अपने भूखे-प्यासे बच्चों की खातिर मुट्ठी-भर सेव के लिए उसे अपनी अस्मत त्यागनी पड़ती है, उसका क्या वर्णन किया जाए? यह उपन्यास पाठकों को अन्दर तक झकझोर देता है। जो घटनाएँ घटित होती हैं, उनसे हम भी सन्न रह जाते हैं। राधाक्का के जीवन-संघर्ष और उसकी मार्मिक दास्तान को पाठक लम्बे समय तक नहीं भूल पाएँगे।

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Sulabha Kore
Editor Not Selected
Publication Year 2024
Edition Year 2024, Ed. 1st
Pages 192p
Price ₹250.00
Publisher Radhakrishna Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1
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Ashok Vatkar

Author: Ashok Vatkar

अशोक वटकर

20 अक्टूबर, 1947 में कोल्हापुर, महाराष्ट्र के वड़गाँव में जन्मे अशोक नामदेव वटकर मराठी ​के चर्चित कथाकार हैं। उन्होंने संस्कृत में एम.ए. किया। ऋग्वेद का समय निर्धारित करने के लिए शोध किया और

पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। राजाराम कॉलेज, कोल्हापुर में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रहे। ‘कैलास मानस’ (1988) उनका चर्चित यात्रा-वृत्तान्त है। ‘अथर्वीय जग’ (1980), ‘फॉस्कर’ (1980), ‘क्रॅब’ (1983), ‘पब्लिक’ (1983), ‘गोरी बायको’ (1984), ‘बगाड’ (1984), ‘सलामी’ (1988), ‘विलक्षण विद्यापती’ (1990) आदि उपन्यासों के अलावा ‘मेलेलं पाणी’ और ‘72 मील’ उनके आत्मकथात्मक उपन्यास हैं।  ‘72 मील’ पर  ‘72 मील : एक प्रवास’ नाम से मराठी फिल्म बन चुकी है। ‘मेलेलं पाणी’ को महाराष्ट्र शासन का उत्कृष्ट उपन्यास लेखन पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

सन् 2001 में उनका निधन हुआ।

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