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Atmakatha-Hard Cover

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9788197509636
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यह अपने देश के लिए फाँसी का फन्दा चूम लेने वाले एक क्रान्तिकारी की आत्मकथा है। आप इसे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रामाणिक दस्तावेज की तरह भी पढ़ सकते हैं।

बिस्मिल को काकोरी कांड में फाँसी की सजा मिली थी। यह आत्मकथा उन्होंने गोरखपुर जेल की कालकोठरी में बैठकर लिखी थी। क्रान्तिकारी आन्दोलन में कूदने से पहले भी उन्होंने कठिन जीवन जिया था और क्रान्तिकारी जीवन अपनाने के बाद तो संघर्ष ही उनका जीवन हो गया था। इसकी स्पष्ट झलक इस पुस्तक में दिखाई देती है। बिस्मिल ने इसमें अपने ऊपर पड़े आर्य समाजी प्रभावों और उसकी प्रेरणा से आर्य समाज में किए गए अपने कार्यों के बारे में भी बताया है। कांग्रेस के प्रति आकर्षण और आखिरकार क्रान्तिकारी विचारों को अपने अनुकूल पाकर उस राह पर आगे बढ़ने का संक्षेप में ही लेकिन मानीखेज विवरण दिया है।

पुस्तक में 1918-19 के मैनपुरी मामले का भी हवाला है जिसमें बिस्मिल भी शामिल थे। उत्तर भारत में यह एक महत्त्वपूर्ण क्रान्तिकारी कार्रवाई थी जिसमें बंगाल के क्रान्तिकारियों की भूमिका नहीं थी। इस मामले में काफी समय तक भूमिगत रहने के बाद बिस्मिल जब बाहर आए तब हिन्दुस्तान रिप​ब्लिक एसोसिएशन की स्थापना में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। इसके बाद ही काकोरी कांड हुआ, जिसमें उन्हें फाँसी की सजा मिली। ये सभी प्रसंग इस पुस्तक में वर्णित हैं।

इससे जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है, वह एक क्रान्तिकारी का विकास ही नहीं है, बल्कि उसके विचारों का विकास भी है, जिसमें वह अपने संघर्ष को जन-आन्दोलन बनते देखना चाहता है और उसके लिए साहस के साथ-साथ साहित्य की भूमिका को भी महत्त्वपूर्ण मानता है। आश्चर्य नहीं कि बिस्मिल ने क्रान्तिकारी कार्रवाइयों के साथ-साथ कलम चलाना भी आजीवन जारी रखा। यह आत्मकथा तो उन्होंने अपनी फाँसी के दो दिन पहले पूरी की जो अपने देश से प्यार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए पठनीय और संग्रहणीय है। 

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back, Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 158p
Price ₹695.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 20.5 X 13.5 X 1
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Author: Ram Prasad 'Bismil'

रामप्रसाद बिस्मिल

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के अग्रणी क्रान्तिकारी थे। वे शायर भी थे। उनका जन्म 11 जून, 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में हुआ था। चौदह वर्ष की उम्र में उन्होंने उर्दू का चौथा दर्जा पास किया पर उर्दू मिडिल की परीक्षा पास नहीं कर सके और अंग्रेजी पढ़ने लगे। युवावस्था में आर्यसमाजी विचारों से प्रभावित होकर आर्य समाज में शामिल हुए। कांग्रेस की तरफ भी आकर्षित हुए लेकिन जल्द ही क्रान्तिकारी विचारों से प्रभावित हो उस राह पर बढ़ चले।

1918 के ‘मैनपुरी षड‍्यंत्र’ में सरकार द्वारा प्रतिबन्धित पुस्तकें बेचने और अपने क्रान्तिकारी दल के लिए सरकारी खजाने को लूटने के आरोप उन पर लगे। 1920 में शचीन्द्रनाथ सान्याल और यदुगोपाल मुखर्जी के साथ हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया जिसका उद्देश्य सशस्त्र क्रान्ति के जरिये भारत में संघीय गणराज्य की स्थापना करना था।

1925 में एसोसिएशन ने काकोरी के पास ट्रेन रोककर सरकारी खजाना लूट लिया। इस मामले में एसोसिएशन के अन्य सदस्यों के साथ बिस्मिल पर भी मुकदमा चला। डेढ़ साल की कानूनी प्रक्रिया के बाद अशफ़ाकउल्ला खाँ, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह के साथ उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई। 19 दिसम्बर, 1927 को गोरखपुर जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई। फाँसी से पहले जेल में ही उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी। वे युवावस्था से ही लेखन करने लगे थे। देशभक्ति के भावों से भरी शायरी के साथ-साथ उन्होंने वैचारिक गद्य भी लिखा जिसमें उनका जोर औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध संघर्ष करने, साम्प्रदायिक सद्भाव तथा राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने पर रहता था। 

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