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Anuvad Mein Visarjan Aur Sarjan Ka Siddhant-Text Book

₹250.00
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9789349180376
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हमारी दुनिया आरम्भ से आज तक, चाहे जितनी विकसित, शिक्षित और परस्पर एक-दूसरे के निकट आई हो, अनुवाद की संवादी भूमिका व्यापक, वैश्विक एवं अनिवार्य हुई है। अनुवाद का इतिहास उतना ही आदिम है, जितना हमारी सभ्यता का। अनुवाद उन कमज़ोर तथा पिछड़े मानव-समूहों एवं राष्ट्रों का तरफ़दार होता है, जो समाजेतिहासिक कारणों से विकास से वंचित रह गए; परन्तु जिन्हें सदैव वंचित रखा नहीं जा सकता। बहुभाषिक दुनिया में अनुवाद के ज़रिये कायम हुई आपसदारी सोद्देश्य और रचनात्मक होती है। इसमें आगे बढ़ने के पहले बहुत सारे आग्रहों और दुराग्रहों तथा निहित स्वार्थ को त्यागना पड़ता है। इस अर्थ में अनुवाद का सरोकार ‘सबकी सुने और सबकी ख़ैर करे’ वाला ज्ञानप्रसारी है। अनुवाद सृजन की मुक्ति-यात्रा है—एक ऐसी यात्रा, जो एक भाषा से आरम्भ होकर दूसरी, तीसरी, फिर चौथी, पाँचवी आदि भाषाओं में अनवरत चलती रहती है।

अनुवाद में विसर्जन और सर्जन का सिद्धान्त पुस्तक में अनुवाद को समय के यथार्थ तथा ज़माने की अपेक्षा और आकांक्षा के अनुरूप विवेचित एवं विश्लेषित करने की कोशिश की गई है। जैसा कि पुस्तक के नाम से ध्वनित है, इसमें ‘अनुवाद में विसर्जन और सर्जन का सिद्धान्त’ नाम से एक अभिनव अनुवाद-सिद्धान्त की रचना का प्रयास किया गया है। इसे स्पष्ट तौर पर समझने के लिए और पहले के अनुवाद-सिद्धान्तों से इसके सर्वथा अलग एवं अभिनव होने के बाबत पुस्तक में प्रचलित अनुवाद-सिद्धान्तों का भी एक अध्याय दिया गया है।

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 168p
Price ₹250.00
Publisher Lokbharti Prakashan
Dimensions 21 X 14 X 1
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Shreenarayan Sameer

Author: Shreenarayan Sameer

श्रीनारायण समीर

श्रीनारायण समीर का जन्म 21 मई, 1959 को चम्पारण, बिहार में हुआ। बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ्फरपुर से हिन्दी में बी. ए. (ऑनर्स) तथा एम. ए. और बेंगलूरु विश्वविद्यालय से ‘अनुवाद : सिद्धान्त और सृजन’ विषय पर पी-एच.डी. की उपाधि। कोयला नगरी धनबाद में पत्रकारिता से पेशेवर जीवन की शुरुआत। राँची विश्वविद्यालय के पी. के. रॉय मेमोरियल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में सात वर्षों तक अध्यापन। केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो के बेंगलूरु केन्द्र में लम्बे समय तक कार्यरत रहे। ‘कतार’ पत्रिका के प्रारम्भिक दस अंकों का सम्पादन। ‘भारत दुर्दशा’, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी और नागार्जुन के रचनाकर्म तथा स्त्री-विमर्श पर महत्त्वपूर्ण लेखन। उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं—‘अनुवाद : अवधारणा एवं विमर्श’, ‘अनुवाद और उत्तर-आधुनिक अवधारणाएँ’, ‘अनुवाद की प्रक्रिया, तकनीक और समस्याएँ’, ‘अनुवाद का नया विमर्श’, ‘हिन्दी : आकांक्षा और यथार्थ’।

केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो के निदेशक पद से अवकाश प्राप्त। फिलहाल स्वतंत्र लेखन।

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