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Zindagi Se Darte Ho-Paper Back

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अमिताभ सिंह बघेल ने अपनी तरह-तरह की साहित्यिक और सांस्कृतिक दिलचस्प‌ियों के साथ ही, अब उर्दू शाइरी को देवनागरी लिपि में पेश करने की तरफ पेशक़दमी की है, लेक‌िन एक ज़रा फ़र्क़ के साथ और वो यह कि उन्होंने इस काम के लिए ग़ज़ल नहीं बल्क‌ि नज़्म का इंत‌िख़ाब किया है।... उन्नीसवीं सदी में यही काम, उर्दू के ज़रिए सारे मज़हबों को जोड़ने के दायरे में, और ज़्यादा बड़े पैमाने पर मुंशी नवल किशोर ने किया था। बघेल साहब इसी रौशन विरासत को जारी रखने और आगे बढ़ाने के आरज़ूमन्द दिलों और ‌दिमाग़ों की नई नस्ल के निहायत मज़बूत इरादों वाले शख़्स हैं जिन्हें क़ुदरत से गहरी-बामानी सोच और रचनात्मकता हासिल हुई है।...

—फ़रहत एहसास

नून मीम राशिद की नज़्मों का हिन्दी में आना एक ख़ुशगवार मौक़ा है। उर्दू शाइरी को नागरी लिपि में पढ़ने वाले पहले ही अच्छी ख़ासी तादाद में मौजूद हैं, फिर भी, इस किताब का आना एक ऐसी कमी को पूरा करेगा जो नज़्म के आशिक़ों ने हमेशा महसूस की है। इंसानी ज़िन्दगी की हक़ीक़त और उससे बरामद तज्रबों की आँच हमारे तख़य्युल को जो उड़ान बख़्शती है उसका बदल मुमकिन नहीं। ऐसे में राशिद को पढ़ना हर बार हमें एक नए सिरे से इस उड़ान का हिस्सा बनाता है। ज़ात ओ काइनात के मसअलों से उलझने वाली ये नज़्में बेदार और बाख़बर ज़ेहनों के लिए यक़ीनन सामान-ए-तस्कीन बनेंगी। राशिद की शाइरी का भरपूर तअर्रुफ़ कराती इस किताब में अमिताभ सिंह बघेल ने नज़्मों का चयन और लिप्यन्तरण बहुत दिल-जमई से किया है। मुझे यक़ीन है कि अदबी हलक़ों में इस किताब की पज़ीराई होगी और राशिद का नाम और काम तलाश कर उन्हें पढ़ने वालों की तादाद भी बढ़ेगी।

—अभिषेक शुक्ला

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Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Not Selected
Editor Amitabh Singh Baghel
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 184p
Price ₹299.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 21.5 X 14 X 1
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Noon Meem Rashid

Author: Noon Meem Rashid

नून मीम रा‌शिद

उर्दू साहित्य में आधुनिकतावाद के प्रणेताओं में से एक नून मीम राशिद का पूरा नाम नज़र मुहम्मद राशिद था। उनका जन्म पंजाब के गुजराँवाला ज़िले के कोटबग्गा गाँव में 1 अगस्त, 1910 को हुआ था। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर के बाद उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान रॉयल इंडियन आर्मी में अपनी सेवाएँ दीं। विभाजन से पहले नई दिल्ली और लखनऊ में ऑल इंडिया रेडियो में रहे। 1947 में उनका स्थानांतरण पेशावर हो गया जहाँ उन्होंने 1953 तक काम किया। बाद में वॉयस ऑफ़ अमेरिका में काम के लिए न्यूयॉर्क गए। कुछ समय ईरान में भी रहे। इसके बाद यूनाइटेड नेशंस से जुड़े और इस दौरान कई मुल्कों में काम किया।

उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं—‘ईरान में अजनबी’, ‘ला-इंसान’, ‘गुमान का मुमकिन’ और उनके निबन्धों का संग्रह ‘मक़ालात’ जिसे शिमा मजीद ने सम्पादित किया है।

उनकी सुप्रसिद्ध नज़्म ‘ज़िन्दगी से डरते हो’ फ़िल्म ‘पीपली लाइव’ में एक गीत के रूप में भी चर्चित हुई थी जिसे ‘इंडियन ओशन’ समूह ने गाया था।

9 अक्तूबर, 1975 को उनका निधन हो गया।

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