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Vyasparva

Author: Durga Bhagwat
Translator: Vasantika Puntambekar
Edition: 2025, Ed. 1st
Language: Hindi
Publisher: Rajkamal Prakashan
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Vyasparva

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महाभारत भारतीय मनीषा की ऐसी पूँजीभूत अभिव्यक्ति है कि इसके बारे में यह कथन अतियुक्ति नहीं लगती कि जो कुछ भारत में है वह सब महाभारत में है, और जो इसमें नहीं है वह कहीं नहीं है। आश्चर्य नहीं कि ऐसे महाग्रन्थ का अध्ययन, मनन और उसकी व्याख्या किसी के लिए भी आसान नहीं है। उसके सामाजिक आशय के सम्यक स्वरूप को पहचानना अथवा विशद रूप में समझाना तो और भी कठिन है। इस कठिनाई के प्रत्युत्तरस्वरूप, मराठी भाषा की प्रमुख चिन्तक-साहित्यकार दुर्गा भागवत ने इस पुस्तक में, महाभारत के सत्य को उसके प्रमुख पात्रों के ज़रिये अत्यन्त सहज और लालित्यपूर्ण ढंग से व्याख्यायित किया है।

‘व्यासपर्व’ गहन चिन्तन और ललित अभिव्यक्ति के सहज सामंजस्य से निर्मित कृति है जिसमें विदुषी लेखक ने स्पष्ट किया है कि करुणा जब प्राणों में बस जाती है तभी धर्म का दर्शन होता है। उन्होंने इस जीवन-सत्य की ओर भी संकेत किया है कि मनुष्य मूलतः मनुष्य है; उसका लक्ष्य भी मनुष्य ही है।

श्रीकृष्ण, भीष्म, द्रोण, गान्धारी, अश्वत्थामा, अर्जुन, दुर्योधन, कर्ण, विदुर, द्रौपदी, एकलव्य आदि की अद्भुत झाँकी इस पुस्तक में साकार उपस्थित हुई है जिनमें व्यक्तित्व और इतिहास ही नहीं, हमारा समय भी मुखरित होता है।

निःसन्देह ‘व्यासपर्व’ भारतीय संस्कृति की एक बहुआयामी व्याख्या है। यह कृति गद्य भी है और काव्य भी, जो ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ के समन्वित स्वरूप को उद्भासित करती है।

बार-बार पढ़ने और संग्रह करने योग्य एक अनुपम पुस्तक।  

More Information
Language Hindi
Binding Paper Back
Translator Vasantika Puntambekar
Editor Not Selected
Publication Year 2025
Edition Year 2025, Ed. 1st
Pages 152p
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 20 X 13 X 1
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Durga Bhagwat

Author: Durga Bhagwat

दुर्गा भागवत

दुर्गा भागवत का जन्म 10 फ़रवरी, 1910 को इन्दौर, मध्य प्रदेश में हुआ। उन्होंने मुम्बई से 1932 में एम.ए. (संस्कृत) किया। लोक-साहित्य के अध्ययन एवं लेखन में सक्रिय रहीं। 1957 में मराठी शोध-पत्रिका ‘साहित्य सहकार’ की सम्पादक, 1958-59 में पूना के ‘गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिक्स’ के समाजशास्त्र विभाग की अध्यक्ष रहीं। 1976 में अ. भा. मराठी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्ष निर्वाचित हुईं। उनकी पैंतीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुईं जिनमें प्रमुख हैं—‘ऋतुचक्र’, ‘भावमुद्रा’, ‘व्यासपर्व’, ‘पायस’, ‘पूर्वा’, ‘तुलसीलग्न’, ‘धर्म आणि लोक साहित्य’, ‘रूपरंग’, ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’ और ‘अश्वल’। ‘पायस’ के लिए उन्हें ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया।

7 मई, 2002 को उनका निधन हुआ।

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