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Visham Raag-Hard Cover

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साहित्य के मौजूदा दौर में पाठ–सुख वाली कहानियाँ कम होती जा रही हैं। इस संकलन की कहानियों में पाठ–सुख भरपूर है। लेकिन यह सुख तात्कालिक नहीं है, बल्कि ये निर्विवाद कहानियाँ देर तक स्मृति में बनी रहती हैं।

लोकप्रियता और विचार–केन्द्रित कथा का मिज़ाज मुश्किल से मिलता है, पर इन कहानियों में यह सुमेल इसलिए सम्भव हो पाया, क्योंकि यहाँ पाठकों के प्रति गम्भीर सम्मान है। ये कहानियाँ पाठकों को उपभोक्ता नहीं, सहभोक्ता; श्रोता नहीं, संवादक बनने का अवसर देती हैं। इनमें विचार उपलाता नहीं, अन्तर्धारा की तरह बहता है, क्योंकि यह सृजन पाठक–लेखक सहभागिता पर टिका है।

इस संकलन का कथा–क्षेत्र काफ़ी खुला है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पश्चिमी बंगाल, बिहार, दिल्ली, पंजाब तक। नए–नए पेशे, नए दस्तकार हैं। ये जड़ परम्परा, नई परिस्थितियों से घिरे इनसानों की नाउम्मीदी, छोटी–छोटी उम्मीदों, कशमकशों, छटपटाहटों और उबरने की कोशिशों की कहानियाँ हैं। इनके चरित्रों में विभिन्न समुदायों, आस्थाओं, क्षेत्रों से आई स्त्रियाँ हैं जिनके दुख तो पुराने हैं पर उनसे टकराने के तरीक़े और सुख नए हैं। इनके झुग्गी–झोंपड़ी निवासी, आदिवासी, दलित और दस्तकार शाश्वत समस्याओं और बड़ी परिघटनाओं के भँवर में फँसे हैं। उनकी अदम्य जिजीविषा, राग–रंग और ज़िन्दगी से प्यार की कहानियों पर देश के आख़िरी दो दशकों की छाया देखी जा सकती है। युग की प्रमुख आवाज़ों को सुरक्षित रखना इतिहास की ज़िम्मेवारी है, छोटी–छोटी अनुगूँजों को सहेजना साहित्य की। मनुष्य विरोधी मूल्यों, सत्ताओं और संगठित संघर्षों की बड़ी उपस्थिति के बावजूद लघु, असंगठित और प्राय: व्यक्तिगत संघर्षों की बड़ी दुनिया है। इन कहानियों में उसी की अनुगूँजें हैं।

ये कहानियाँ किसी एक शैली में नहीं बँधी हैं, बल्कि हर कहानी का अलग और स्वतंत्र व्यक्तित्व नई भाषा, नई संरचना और आन्तरिक गतिशीलता के सहारे निर्मित किया गया है। प्रयोगधर्मिता इन कहानियों का गुण तो है पर ये प्रयोग अटपटे या दिखावटी नहीं, बल्कि सहज और स्वीकार्य हैं। कई पुरस्कारों से सम्मानित अरुण प्रकाश का यह एक विरल संग्रह है।

More Information
Language Hindi
Binding Hard Back
Translator Not Selected
Editor Not Selected
Publication Year 2003
Edition Year 2003, Ed. 1st
Pages 372p
Price ₹350.00
Publisher Rajkamal Prakashan
Dimensions 22 X 14.5 X 3
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Arun Prakash

Author: Arun Prakash

अरुण प्रकाश

जन्म : 1948; बेगूसराय (बिहार)।

शिक्षा : स्नातक, प्रबन्‍ध विज्ञान और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।

कहानी-संग्रह : ‘भैया एक्सप्रेस’, ‘जल-प्रान्‍तर’, ‘मँझधार किनारे’, ‘लाखों के बोल सहे’, ‘विषम राग’।

उपन्यास : ‘कोंपल कथा’।

कविता संकलन : ‘रात के बारे में’।

अनुवाद : अंग्रेज़ी से हिन्दी में विभिन्न विषयों की आठ पुस्तकों का अनुवाद।

अनुभव : कुछ अख़बारों, पत्रिकाओं का सम्पादन, कई धारावाहिकों, वृत्तचित्रों तथा टेलीफ़‍िल्मों से सम्बद्ध रहे। दूरदर्शन की बहुचर्चित टीवी सांस्कृतिक पत्रिका ‘परख’ के क़रीब 450 एपीसोड लिखे। ‘साहित्य अकादेमी’ की साहित्यिक पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के सम्‍पादक रहे। कई स्तम्भों का लेखन। कथा-समीक्षा और आलोचना लेखन। अनेक राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में सहभागिता की।

सम्मान : ‘साहित्यकार सम्मान’, हिन्दी अकादमी, दिल्ली; ‘कृति पुरस्कार’, हिन्दी अकादमी, दिल्ली; ‘रेणु पुरस्कार’, बिहार शासन; ‘दिनकर सम्मान’; ‘सुभाषचन्द्र बोस कथा सम्मान’; ‘कृष्ण प्रताप स्मृति कथा पुरस्कार’।

निधन : 18 जून, 2012

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